Saturday, 25 July 2015

आओ कारपोरेटों, हम ढोयेंगे पालकी, यही हुई है राय संघी गिरोह की...


इस देश का बजट तो बनता ही है कार्पोरेटों द्वारा, कार्पोरेटों और विदेशियों के लिए. अतः उनसे क्या छुपाना! बजट की 'पवित्र' गोपनीयता तो पब्लिक के लिए होती है, सो लीक्ड बजट अब भी पब्लिक से गोपनीय है.इसी 'लीक्ड' बजट को कारपोरेटों के सरताज संसद में रखेंगे.यह वही संसद है, जिसमे घुसने से पहले फेंकू महाराज ने अपनी नाक रगड़ी थी और घुसने के बाद उसकी नाक काटते देर नहीं लगाई.
तो दोस्तों, जासूसी हो गई, तो हो गई. बजट लीक हो गया, तो हो गया. इसमें घबराने की क्या बात है! जिसके लिए लीक होना था, उसके लिए ही लीक हुआ. वे अब इस देश पर थोडा और दबाव डालेंगे कि अर्थव्यवस्था को पटरी पर रखने के लिए कुछ लाख करोड़ रुपयों की थोडा और रियायत दो, तो अर्थव्यवस्था की सेहत के लिए यह अच्छा ही है.पब्लिक को तो पता चल ही जायेगा. यदि उसके लिए लीक हो जाता, तो मांगती भी क्या वह?....माई-बाप, पेट्रोल-डीजल की कीमत कम कर दे! माई-बाप, मुझ पर लग रहे टैक्स के बोझ में कुछ हजार की राहत दे दे!! माई-बाप, चावल-गेंहू, दाल-शक्कर सस्ता कर दे!!! माई-बाप, मेरी पैदावार का समर्थन मूल्य दे दे!!!! माई-बाप, जमीन मत छीन, मुझे जमीन का पट्टा दे दे!!!!!....बताओ, यह भी कोई मांगना हुआ? ऐसी मांग तो वह 67-68 सालों से कर ही रही है, बजट के बाद फिर कर लेगी. इसके लिए इतनी हाय-तौबा क्यों?? उसके पास इतना जिगर कहां और कहां ऐसी मज़बूत छप्पर कि लाखों करोड़ की रियायत मांगे???
और जिस तरह यह बजट लीक होना था, उसी तरह हुआ, गरिमामय ढंग से, जासूसी के जरिये. वरना बताओ, बजट चोरी हो जाता, तो दुनिया में हम किसको मुंह दिखने लायक रहते? दुनिया हम पर हंसती नहीं कि देखो हम चोरी भी रोकने के काबिल नहीं!! अब हम कह सकते हैं कि जिस जासूसी पर अमेरिका का बस नहीं, वहां हम कौन होते है जासूसी रोकने वाले?....और हम तो बुला ही रहे हैं कारपोरेटों को, बुला ही रहे हैं ऍफ़डीआई और अमेरिका को कि आओ, हमारे घर में सेंध लगाओ. हम अपनी चोरी का माल वापस लेंगे, बदले में अपना पूरा घर सौंपेंगे.हम तो तुम्हारी पालकी ढोने के लिए ही पैदा हुए हैं. इसलिए आओ, तुम्हारी जासूसी और पलक-पांवड़े हमारे.
आओ रिलायंस, पूरा बजट तुम्हारा. आओ एस्सार, पूरा खजाना तुम्हारा. आओ केयन्स इंडिया, पूरा भारत तुम्हारा. आओ जुबिलेंट, पूरी एनर्जी तुम्हारी. तुम सब तो हमारे देश की आत्मनिर्भरता के प्रतीक हो, चाँद-तारे-सितारे हो. तुम्हीं सब तो हमारी पार्टी-फण्ड के अमूल्य स्रोत हो. न होता तुम्हारा फण्ड, न होती तुम्हारी प्रचार तंत्र की ताक़त, तो कहां रहते हम? इसलिए लो, तुम्हारे चरणों में यह बजट समर्पित.
जोर से बोलो-- संघी गिरोह की जय, कार्पोरेटों की जय-जय.

इन 'राजद्रोही' कार्पोरेट मालिकों को गिरफ्तार करो....


सवाल ये नहीं है कि यह दस हजार करोड़ का घोटाला है या दस लाख करोड़ का. असली बात ये है कि ये कार्पोरेट जासूसी है--पेट्रोलियम मंत्रालय से लेकर कोयला और बिजली मंत्रालय होते हुए रक्षा मंत्रालय तक फैला हुआ. थोड़ी और छानबीन हो जाएं, तो कोई भी मंत्रालय बेदाग़ नहीं बचेगा. और ये जासूसी इस देश की कार्पोरेट कम्पनियां ही कर रही है, जिनकी विदेशी पूंजी के साथ सीधी मिलीभगत है. इसलिए इस जासूसी से जो भी बातें लीक हुई है, वह विदेशी हाथों तक भी पहुंची ही होगी. हमारे ये 'देशभक्त' कार्पोरेट इस देश की सुरक्षा संबंधी गोपनीय तथ्यों को विदेशी हाथों को भी बेच रहे हैं.
और क्या यह संभव है कि ऐसी जासूसी इस देश की कार्पोरेट कंपनियों के मालिकों की जानकारियों के बिना हो रही है, जिन्हें इस जासूसी से हजारों करोड़ का सीधा फायदा हो रहा है? क्या ये केवल इन कार्पोरेट कंपनियों के मैनेजर, डीजीएम या सीनियर एग्जीक्यूटिव की ही सनक थी?? दस्तावेजों तक ये सेंधमारी क्या केवल कुछ कर्मचारियों का ही कमाल है???
देश की सुरक्षा और गोपनीयता से खिलवाड़ करने वाले इस जासूसी कांड का पर्दाफाश होना जरूरी है-- और यह तभी हो सकता है, जब इन कार्पोरेट मालिकों को भी गिरफ्तार किया जाएं और इन पर 'राजद्रोह' का मुक़दमा कायम किया जाएं. इनकी गिरफ़्तारी के बिना इस जासूसों कांड के तार बेनकाब नहीं हो सकते, इस कांड में जिन उच्चपदस्थ अधिकारियों व राजनेताओं की संलिप्तता है, वह सामने नहीं आ सकती है.
लेकिन लगता है कि कुछ छोटे पुर्जों को ही निशाना बनाकर पूरे मामले को ही रफा-दफा कर दिया जायेगा. कार्पोरेट पूंजी के बल पर टिकी मोदी सरकार और संघी गिरोह इससे ज्यादा कुछ नहीं कर सकती. इनकी कथित 'देशभक्ति' को यही पर तार-तार होता हुआ हम देख सकते हैं.

मौत बांटने वाली नीतियां


नव-उदारीकरण की नीतियां भूख का साम्राज्य स्थापित करती है. यह अनुभव सभी विकासशील देशों का है. भारत का भी यही अनुभव है. मोदी राज में इस अनुभव का केवल विस्तार हो रहा है. वे दीदादिलेरी से खैरात बांटने में व्यस्त है...और इधर किसान आत्महत्या करने के लिए मजबूर.
भूख से मरने की खबर अब छत्तीसगढ़ के किये भी नई नहीं रही. यह वही 'धान का कटोरा' है, जो आज राख के ढेर में तब्दील हो रहा है...और इसके लिए कांग्रेस-भाजपा सरकारों की अंधाधुंध औद्योगीकरण की नीतियां ही जिम्मेदार है. आज लगभग 2000 किसान आत्महत्या कर रहे है. इनमें आदिवासी हैं, दलित हैं और अन्य वर्गों के गरीब भी. ये सभी आत्महंता भूख के ही शिकार होते हैं. गांवों में चले जाइए, सरकारी रिपोर्ट की सच्चाई सर चढ़कर बोलेगी कि आधे से ज्यादा महिलायें और बच्चे कुपोषण के शिकार हैं. सभी एक धीमी मौत की ओर बढ़ रहे हैं.
इसलिए सरगुजा में एक बच्चे की भूख से हुई मौत में नया कुछ नहीं है. लेकिन बेशर्म भाजपा सरकार इसे स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है. पोस्टमार्टम रिपोर्ट चीख-चीख कर कह रही है कि बच्चे की मौत भूख से हुई. इतना भूखा था वह कि उसकी अंतड़ियां भी सूख चुकी थी. लेकिन प्रशासन है कि उसे लू से हुई मौत सिद्ध करने में लगा है. कल अखबारों के पन्नों पर यही बहस होगी कि बच्चे की मौत भूख से हुई या लू से? लू से हुई, तो यह ठीक वैसी ही प्राकृतिक आपदा है, जिसकी कहर में कुछ दिनों पहले 65 लोग गंभीर रूप से घायल हुए हैं और एक मजदूर की मौत भी. वे सब बेचारे मोदी की सभा के लिये डोम बनाने में लगे थे....लेकिन मोदी को इतनी भी फुर्सत नहीं थी कि घायलों को ही देख आते. और रमन सरकार तो कमिशनखोर भाजपाई ठेकेदार को बचाने में ही जुटी है.
सवाल फिर भी होगा कि ऐसी कौन सी मुसीबत थी कि बच्चे का पिता अपने बच्चों के साथ पलायन करने के लिए मजबूर हुआ? उसे गांव में ही उस मनरेगा में काम क्यों नहीं मिला, जिसका ढिंढोरा यह सरकार जोर-शोर से पीटती रही है? इस बच्चे के पेट में अन्न के इतने भी दाने क्यों नहीं थे कि लू से बचाव हो पाता, जबकि छत्तीसगढ़ की सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लिए कांग्रेस सरकार ने भी उसे पुरस्कृत किया था?
स्पष्ट है कि मोदी राज के एक साल में छत्तीसगढ़ में भी रोजी-रोटी के मामले में भयंकर गिरावट आई है. यह गिरावट सीधे केन्द्र की नीतियों से जुडती है, जो मनरेगा जैसे रोजगार पैदा करने वाली योजना को बंद करने का इरादा रखती है. फिर फण्ड आबंटन कहां होना है? प्रदेश के 40 लाख मजदूरों की पिछले वर्ष की मजदूरी बकाया है और इस वर्ष काम बंद है, तो केवल इसलिए कि फण्ड नहीं है. यह गिरावट सार्वजनिक वितरण प्रणाली से भी जुडती है, जहां गरीबों से जबरदस्ती राशन कार्ड छीन लिए गए हैं और जिनके पास हैं, उनमें से 50 लाख परिवारों को पिछले वर्ष की तुलना में कम अनाज दिया जा रहा है....और ऐसी सीधी गिरावट इसलिए पैदा की जा रही है कि बाज़ार में उछाल आये!! यही इस सरकार की अर्थनीति है, जिस पर पूरा कार्पोरेट जगत बल्ले-बल्ले है.
इसलिए गरीबों का विकास अलग होता है, अमीरों का विकास अलग. मोदी का 'विकास' उन अमीरों का विकास है, जो इस देश के गरीबों को रौंदकर हो रहा है. इसलिए गरीबों को अपना विकास करना है, तो मोदी के विकास, उसकी अमीरपरस्त नीतियों के खिलाफ लड़कर ही किया जा सकता है....और यही वर्ग-संघर्ष है, जिससे पूरे संघी गिरोह को चिढ है

छत्तीसगढ़: ‘संगठित अपराध’ में बदलता भ्रष्टाचार


केन्द्र व अन्य राज्य सरकारों के समान ही छत्तीसगढ़ में भी प्याज के छिलकों की तरह भाजपाई घोटालों की परतें खुल रही हैं और इसके छींटें मुख्यमंत्री व उनके परिवारों के दामन को दागदार बना रहे हैं। ‘भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टाॅलरेंस’ के वादे और दावे हवा-हवाई हो चुके हैं। ‘स्वच्छ प्रशासन’ का मुखौटा तार-तार हो चुका है। प्रशासन के जिस विभाग में हाथ डालो, घोटाला ही घोटाला। भ्रष्टाचार अब ‘संगठित अपराध’ में बदल गया है।
जिस कृषि संकट से छत्तीसगढ़ गुजर रहा है उसका पता केवल इससे ही चलता है कि पिछले 11 सालों के भाजपाई राज में 20 हजार से ज्यादा किसानों ने आत्महत्यायें की हैं। कारण बहुत ही स्पष्ट है-- मौसम की मार से फसल की बर्बादी, समर्थन मूल्य पर खरीदी न होना तथा ऋणग्रस्तता। लेकिन फसल बर्बादी का कोई मुआवजा किसानों को नहीं मिला, पर निजी बीमा कंपनियों ने हजारों करोड़ रुपयों का मुनाफा कमाया। धान खरीदी से लेकर मीलिंग तथा चावल वितरण तक नेताओं, ठेकेदारों, मिलरों व अफसरों- सबने खूब पैसा बनाया और भाजपा राज में 36 हजार करोड़ रुपयों के घोटालों की बात सामने आ रही है। इस घोटाले में पकड़ी गई डायरी में लिखी जानकारी के अनुसार, यह रकम ‘मैडम सीएम’ तक पहुंची है और इसी पैसे से पिछले विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस के एक उम्मीदवार को मैदान से हटाकर भाजपा के संघी कार्यकर्ता उम्मीदवार की जीत को सुनिश्चित किया गया। पूरी डायरी सार्वजनिक है, लेकिन कोर्ट में डायरी के चंद पन्ने ही पेश किये गये। जिन आरोपी अधिकारियों-कर्मचारियों के घरों से करोड़ों रुपये पकड़ाये, वे ‘सरकारी गवाह’ बना दिये गये हैं। एन्टी करप्शन ब्यूरो राज्य सरकार के तोते की तरह काम कर रहा है, जबकि इस सरकार के कम से कम दो दर्जन आईएएस, आईपीएस, आईएफएस अधिकारियों पर भ्रष्टाचर के आरोपों की जांच चल रही है, जिनके पास कम से कम 10-10 करोड़ की दौलत निकली हैं। इसी के साथ छ.ग. में भी एक ‘व्यापमं घोटाले’ के चिन्ह नजर आने लगे हैं।
मोदी सरकार की मंशा के अनुरुप इस वर्ष मनरेगा के काम पूरे प्रदेश में ठप्प हैं, लेकिन पिछले वर्ष की ही लगभग 45 लाख मजदूरों की 600 करोड़ रुपयों से अधिक की मजदूरी बकाया है। बकाया मजदूरी पिछले 6 माह से दो वर्ष तक की अवधि की है। अब पंचायतों के पदाधिकारी बदल गये हैं और काम करवाने वाले अफसर भी, इस बकाया मजदूरी के मिलने की कोई गारंटी नहीं है।
पीडीएस व्यवस्था में भयंकर कटौती हुई है और 40 लाख परिवारों को आज पहले के तुलना में प्रति परिवार कम अनाज मिल रहा है। 2 हजार करोड़ रुपयों की सब्सिडी यह सरकार बचा रही हैै आम जनता को कुपोषण के गड्ढे में धकेलकर। आदिवासी क्षेत्रों में जिस ‘मुफ्त’ नमक वितरण का शोर मचाया गया, वह घटिया, आयोडीनरहित, बदबूदार नमक साबित हुआ और खाद्य विशेषज्ञ इसे जहरीला बता रहे हैं। भाजपा राज में 7.71 लाख टन ऐसे नमक का वितरण किया गया है। यह पूरा घोटाला 7-8 सौ करोड़ रुपयों का है।
गांव में काम न मिलने, राशन में कटौती होने तथा भूमिहीनता-- यह सब मिलकर भुखमरी पैदा कर रहे हैं। सरगुजा व बिलासपुर जिलों से भूख से दर्दनाक मौतों की घटनायें सामने आई हैं।
जो बिजली प्रदेश सरकार 2.71 रुपये की औसत लागत से पैदा करती है, वह इसे 5.10 रुपये प्रति यूनिट की औसत दर से बेच रही है। इतना भारी मुनाफा कमाने के बाद भी बिजली कंपनियां घाटे का रोना रो रही हैं और सरकार खामोश है, तो मतलब साफ है कि घोटाला चालू आहे।
भूमि अधिग्रहण सबसे बड़ा मुद्दा बन रहा है। आंध्रप्रदेश में बन रहे पोलावरम परियोजना से 25 हजार लोगों के विस्थापित होने और समूचे सुकमा कस्बे के डूबने की आशंका है। उत्तरप्रदेश में कन्हर नदी पर बांध बनाया जा रहा है और छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले के 27 गांव प्रभावित हो रहे हैं। बस्तर में डिलमिली में लौह उद्योग स्थापना का प्रयास जारी है, जिसके लिए आदिवासियों को विस्थापित किया जाएगा। इस प्रस्तावित प्लांट क्षेत्र की 4 हजार एकड़ जमीन नेताओं-अफसरों-व्यापारियों ने पानी के भाव, 5 हजार रुपये प्रति एकड़, के भाव से खरीदकर रख ली है।
शिक्षा के युक्ति युक्तकरण के नाम से प्रदेश के 3 हजार सरकारी स्कूल बंद कर दिये गये हैं। अधिकांश स्कूल आदिवासी क्षेत्रों के हैं। 1.5 लाख बच्चे शिक्षा क्षेत्र से बाहर हो गये हैं। इनमें अधिकांश आदिवासी व छात्राएं हैं। इन क्षेत्रों में अब संघी स्कूलों को खोलने की तैयारियां की जा रही हैं, जो बच्चों को अवैज्ञानिक शिक्षा देने का ‘महान’ काम करेंगे।
प्रतिभाशाली आदिवासी बच्चों को सरकारी खर्च पर अच्छी शिक्षा देने की योजना का बड़ा ढोल पीटा गया, लेकिन उन्हें फर्जी निजी स्कूलों में भर्ती किया गया, जिनके मालिक इन बच्चों से अपने घर में बर्तन मंजवाने का काम करवा रहे हैं। राजधानी रायपुर में ही ऐसे तीन बच्चों को छुड़वाया गया है, जिन्हें बंधुआ बनाकर रखा गया था। ऐसे फर्जी निजी स्कूलों को प्रति छात्र 75 हजार रुपये फीस के रुप में दिये जा रहे हैं, जबकि यह निजी स्कूल आरटीई कानून तक लागू करने के लिए तैयार नहीं हैं।
साफ है कि छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार न केवल आर्थिक रुप से, बल्कि नैतिक रुप से भी भ्रष्ट साबित हुई है। लेकिन इसका विकल्प वामपंथी एकता पर आधारित जनसंघर्षों के विकास से ही विकसित हो सकता है। विकल्प होने के कांग्रेस के दावे को तो आम जनता लगातार तीन बार ठुकरा ही चुकी है।

बोलो, लेकिन आपस की बात है कि पोल न खोलो

बोलो, लेकिन आपस की बात है कि पोल न खोलो
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'एसोचैम' ने कहने के लिए कुछ न छोड़ा. पानी-पानी कर दिया उसने -- सरकार को भी, पार्टी को भी. इतना भी नहीं सोचा कि जिस सरकार के दावे की धज्जियां वह उड़ा रही है, उसे तो उन्हीं की प्रतिनिधि पार्टी चला रही है. आम जनता गरियाए तो समझ में आता है. गरीब बेचारे गरिया ही सकते हैं. रोना-धोना, चिल्ल-पों ही कर सकते हैं. बहुत हुआ तो धरना-प्रदर्शन. उनके गरियाने की हमें चिंता नहीं. चुनावी मौसम आने दो, फिर पटा लेंगे दारू-पैसे से. लेकिन ये उद्योगपति ! इन्हीं की चिंता में दुबले हुए जा रहे हैं, लोगों की लात-गालियां खा रहे हैं, लेकिन ये भी गरियाने पर उतर आये !! टैक्स चोरी के मौके दिए, टैक्स माफ़ किये. गरीब से जमीन छीनकर इनके चरणों में धर दिया. इनके मन-माफिक श्रम कानून बना दिए. बता दिया कि न कोई न्यूनतम मजदूरी होगी और न काम के घंटे तय होंगे. कह दिया कि काम करना है तो करो, विकास में भागीदार बनना है तो बनो, वर्ना छुट्टी !!! फिर भी ये अपने न हुए, पराये हो गए.हाय, ये भी उतर आये गरियाने पर. अब क्या अपना गला काटकर इन्हें दे दें?!
कह रहे हैं कि छत्तीसगढ़ में निवेश का वातावरण नहीं है. कागजों में ही काम हो रहा है. अधोसंरचना के विकास पर कोई ध्यान नहीं. बता रहे हैं कि कृषि क्षेत्र में गिरावट तो आई ही है, उद्योगों के साथ ही निर्माण व रियल स्टेट के क्षेत्र में भी गिरावट आई है. अरे भाई, जब कंट्री बिल्डिंग का काम आज तक कागजों में हो रहा है, तो स्टेट की प्लानिंग भी तो कागजों में ही बनेगी. पता नहीं, इन पूंजीपतियों को कागजों से क्यों इतना बैर हो गया है? बड़े-बड़े निर्माण कागजों में ही करके हमने इन पूंजीपतियों की जेब में डाले. अब भी पूरी-पूरी कोशिश कर रहे हैं कि गांठ से न जाये और तिजोरी में लबालब आये. इतना भी नहीं समझते कि कागजों के काम को पूरा करने लगे, तो न हम फूलेंगे, न ये फलेंगे. बस 'अधो-संरचना, अधो-संरचना' चिल्लाए जा रहे हैं.
आखिर बड़े लोगों की 'समझ' इतनी छोटी क्यों होती हैं? इन्हें इतनी भी समझ नहीं कि कृषि में विकास दर घटी नहीं है, घटाया गया है और इसे घटाने में हमने कितनी मेहनत की है. इसे घटाया ही इसलिए गया है कि ये लोग बढे. अब ये कह रहे हैं कि हमारे पास कोई नीति नहीं है. 'नीति-नीति' अभी तक केवल कम्युनिस्ट ही चिल्लाते थे, इसलिए कि उनके पास कोई नेता नहीं है. अब यदि 'एसोचैम' चिल्लाने लगे, तो दीवार पर सिर पटकने का मन करता है. क्या उन्हें पता नहीं कि हमारे पास नेता भी है और नीति भी. स्पष्ट नीति है हमारे पास -- दूरदृष्टि वाली, पक्के इरादे के नेता के साथ. कृषि भूमि कम होगी, तो रियल स्टेट का कारोबार बढ़ेगा. इससे निर्माण धंधों में तेजी आएगी. गांवों के किसान यदि मजदूर बनेंगे, तो इस धंधे में सस्ते मजदूर मिलेंगे. मजदूरी सस्ती होने से लागत कम होगी और मुनाफा भारी. खेती छोड़कर जब ये मजदूर बाज़ार में आयेंगे, तो मजदूरी देने में गँवाए पैसे भी घर में ही आयेंगे. इस बरकत से काले धन को भी सफ़ेद किया जा सकेगा -- कहीं निवेश के नाम पर, तो कहीं घाटे के कारखाने को फायदे में दिखाकर. कारखाने फायदे में दिखेंगे, तो शेयर के भाव भी खूब उछलेंगे. उछलते शेयरों से फिर हम सब अपनी तिजोरियां भरेंगे. तिजोरियां जितनी बड़ी होंगी, जल-जंगल, जमीन-खनिज पर उतना ही भारी कब्ज़ा होगा. धीमी पड़ी हुई परियोजनाएं आगे बढेंगी, रुकी हुई चलेंगी. इन परियोजनाओं के दौड़ने-चलने से ही देश का 'विकास' होगा.
चुनाव में भी हमने यही नारा दिया था -- विकास का. सो, हमारी सरकार विकास के लिए पूरा जोर लगा रही है. विकास बढेगा, तो देश बढेगा. यही हमारी स्पष्ट नीति है. इस नीति को आगे बढाने के लिए हम्मरे पास मोदी भी है और रमन भी. दोनों को आगे बढ़ाने के लिए संघ भी है और संघी दल भी.
सो एसोचैम के मालिकों, वामपंथियों-जैसे गिरावट का रोना न रोओ. देखो कि कमजोरी कहां रह गयी है. देखो कि कृषि घाटी, तो हमारा धंधा क्यों नहीं चमका? देखो और हमें बताओ कि काले धन के साथ ही विदेशी धन का आना कहां-कैसे रूक गया. कहीं काले धन ने ही तो गुस्सा होकर विदेशी निवेश को नहीं रोक लिया? दोनों में कहीं रिश्तेदारी तो नहीं?? रोओ-धोओ नहीं, हमें बताओ कि तुम्हारे लिए हमें और क्या-क्या करना है, कहां-कहां करना है, कहां-कितना-कैसे काला-पीला करना है??? आखिर हमारा-तुम्हारा जन्म-जन्मांतर का संबंध है. ये हम भी जानते हैं, तुम भी जानते हो. तुम जानते हो की हम तुम्हारे लिए ही बैठे हैं. हम भी जानते हैं कि तुम हमारे मालिक हो. मालिक को नाराज़ करके हम भला बढ़ सकते है? आखिर मालिक की बरकत में ही हमारी भी भलाई हैं. सो मालिकों, बोलो कि मोदी-रमन की इस जोड़ी को और क्या करना है???
बोलो, लेकिन आपस की बात है कि पोल न खोलो. पोल खुलने से वोट खिसकने का डर रहता है.

Wednesday, 8 July 2015

' टोबा टेकसिंह ' उर्फ़ ' बाकी सब खैरियत है '

मंटो की कहानी पर आधारित यह नाटक महाराष्ट्र मंडल के मंच पर इप्टा, रायपुर द्वारा मंचित किया गया था.
' टोबा टेकसिंह ' उर्फ़ ' बाकी सब खैरियत है '
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" मनों मिट्टी के नीचे पहुंचते ही मंटो ने फिर सोचा कि वो बड़ा अफ़सानानिगार है या खुदा.
खुदा ने मंटो के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा : यह ' टोबा टेकसिंह ' तुमने लिखा है?
मंटो ने कहा -- लिखा है तो क्या हुआ?....हटाओ अपना हाथ.
खुदा के चेहरे पर एक अजीब सी मुस्कराहट आई. उसने मंटो के कंधे पर से अपना हाथ हटा लिया और उसकी तरफ़ अज़ीब नज़रों से देखकर कहने लगा -- जा, तेरे सारे गुनाह माफ़ किये."
मंटो की मौत के बाद देवेन्द्र सत्यार्थी का यह अफ़साना है, जो बता रहे हैं कि मंटो की ' टोबा टेकसिंह ' उसकी पूरी लेखनी और गुनाहों पर भारी है. और मंटो के गुनाह क्या थे? यही कि उन्होंने अपने समय और पुरूषवादी समाज की तथाकथित नैतिकता, उसकी क्रूर यौनिकता और झूठ का बेरहमी से पर्दाफ़ाश किया. इसके लिए उन्होंने वेश्याओं, शराबियों और जुआडियों को अपनी कहानियों का पात्र बनाया. तब की साहित्यिक दुनिया के वे सबसे बड़े 'छिनाल ' थे कि खुदा भी उनसे रूठा हुआ था. समकालीन प्रगतिशील आंदोलन ने भी उन्हें पूरी तरह स्वीकार नहीं किया. 1945 में प्रगतिशील उर्दू लेखकों के सम्मलेन में ' साहित्य में अश्लीलता परोसने के लिए ' उनके खिलाफ एक प्रस्ताव पारित होते-होते बचा. पकिस्तान में उनके साहित्य पर प्रतिबन्ध लगा, जबकि हिंदुस्तान के विभाजन के बाद उन्होंने पाकिस्तान को अपना वतन बनाया. इसके बावजूद वे इस विभाजन को पूरी ज़िंदगी स्वीकार नहीं कर पाए और पाकिस्तान में रहते हुए ही हुक्मरानों को चुनौती देते हुए ' टोबा टेकसिंह ' जैसी एक ऐसी उत्कृष्ट कहानी दी कि खुदा ने भी उनके सारे गुनाहों को माफ़ कर दिया.
मंटो के जीवित रहते भले ही उसे स्वीकारा न गया हो, आज वही ' अश्लील ' मंटो हिंदुस्तान के साहित्यिक जगत में पूरी प्रखरता के साथ चमक रहा है. जब उन्होंने इस दुनिया को छोड़ा, उनकी लिखी कहानी पर बनी फिल्म ' मिर्ज़ा ग़ालिब ' हिट हो चुकी थी, जिसे बाद में पहला राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार ' स्वर्ण कमल ' भी मिला. उनकी मौत के 57 साल बाद, उनकी जन्म शती के मौके पर पकिस्तान सरकार ने उन्हें ' निशान-ए-इम्तियाज़ ' देने का फ़ैसला तो किया, लेकिन फिर भी उसे मंटो की कहानियों से सेंसर हटाना गवारा न हुआ. लेकिन फिर भी, मंटो आज हिंदुस्तान की गंगा-जमुनी साझा संस्कृति और प्रगतिशील विरासत के प्रतीक हैं.
मंटो की कहानी ' टोबा टेकसिंह ' को अपने नाटक में ढालते हुए नाटककार अख्तर अली ने मंटो की विभाजनविरोधी दूसरी कहानियों के संवादों का भी बखूबी इस्तेमाल किया है -- "यह मत कहो कि एक लाख हिन्दू और एक लाख मुसलमान मरे हैं -- यह कहो कि दो लाख इंसान मरे हैं --". यह मंटो की कहानी ' सहाय ' का शुरूआती बयान है -- आवेशभरा, जिसका उतनी ही कुशलता से इस्तेमाल मिन्हाज असद ने अपने नाट्य निर्देशन में किया है और दर्शकों की ज़बरदस्त तालियां बटोरी है.
हिंदुस्तान के भारत और पाकिस्तान के बीच विभाजन की निरर्थकता को दिखाने का मंटो का अपना अंदाज़ है, जो पागलखाने में पागलों के अपने तर्क में दिखता है -- " सियालकोट पहले हिंदुस्तान में होता था, पर अब सुना है कि पाकिस्तान में है -- क्या पता कि लाहौर, जो आज पाकिस्तान में है, कल हिंदुस्तान में चला जाएं -- या सारा हिंदुस्तान ही पाकिस्तान बन जाएं --".
इतिहास गवाह है कि विभाजन के पहले का हिंदुस्तान और आज़ादी के बाद का भारत, सिरफिरों और फिरकापरस्तों के जाल में फंसकर पाकिस्तान बनते जा रहा है. आज भारत का इतिहास भिवंडी से लेकर मुजफ्फरनगर तक दंगों का, मुंबई, गोधरा और गुजरात के कत्ले-आम का, अशांत कश्मीर का, बाबरी मस्ज़िद के विध्वंस का और नफरत के ज़हरीले वातावरण का भारत है. हिन्दू और मुस्लिम दोनों ओर के साम्प्रदायिक पक्षों ने धर्म-निरपेक्षता को कमज़ोर करने का काम किया है और धर्म के नाम पर देश की राजनीति को हांकने की कोशिश कर रहे हैं. मंटो दोनों तरह के फिरकापरस्त जुनून के खिलाफ आज भी दीवार बनकर खड़े हैं.
मंटो खुद भी दो बार पागलखाने में दाखिल हो चुके थे. इसलिए पागलों की ' असभ्य मानवीयता ' और शरीफों की ' सभ्य पाशविकता ' के बीच वे अंतर अच्छे-से कर सकते थे. इसलिए मंटो की जुबानी ' टोबा टेकसिंह ' बोल रहे हों या ' टोबा टेकसिंह ' की जुबानी मंटो --यह भारत और पाकिस्तान दोनों के आम आदमी की कहानी है. ' टोबा टेकसिंह ' की मौत हिंदुस्तान के भारत और पाकिस्तान में विभाजन का तीखा नकार है. ' नो मैंस लैंड ' वह जगह है, जहां टोबा टेकसिंह चीखते हुए पछाड़ खाकर गिरता है. बकौल नरेन्द्र मोहन, उसकी चीख के साथ दो-राष्ट्र का सिद्धांत बेदम हो जाता है. ...यह चीख अपने ही घेरे में दुबके और सहमे व्यक्ति की नहीं है. उस व्यक्ति की है, जो घेरे से बाहर आने के लिए, अपने व्यक्तित्व को कई संदर्भों और अर्थों में पहचानने की कोशिश करता है.' (मंटो और विभाजन)
यह मंटो का ट्रीटमेंट है -- विभाजन के बाद बने मनोविज्ञान को रेखांकित करता हुआ. मिन्हाज़ असद ने न केवल इस ट्रीटमेंट के साथ मंटो को उतारा है, बल्कि विभाजन के मर्म, उसकी त्रासदी और पागलपन को भी पूरी शिद्दत से पेश किया है. नज़ीर अकबराबादी के गीत को अपने संगीत में आबिद अली ने ढालकर इस मंचन को बहुत ज्यादा प्रभावी बनाया है, सब कलाकारों के अभिनय की तारीफ़ तो की ही जानी चाहिए, खासकर काशी नायक (बिशन सिंह), करण खान (मलंग), नितेश लहरी (पागल), अंशु दास (रूप कौर), शेखर नाग (फिरतू), टेसू डोंगरे (पागल मौलवी), मो. ग़ालिब (बन्ने मियां), गौरव मिश्र (हवलदार), अमित मिश्र (वकील) की भूमिकाओं की.
कुल मिलाकर, इप्टा के कुछ माह पहले हुए राज्य सम्मलेन में जो सांगठनिक बदलाव हुए, मंच पर उसका असर भी दिखने लगा है, इप्टा की रंग परंपरा की प्रस्तुति -- ' बाकी सब खैरियत है ' के रूप में.
(लेखक की टिप्पणी -- बतौर एक दर्शक ही) 

मिर्जा मसूद की ‘मिट्टी की गाड़ी’

मिर्जा मसूद की ‘मिट्टी की गाड़ी’
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शूद्रक की ‘मृच्छकटिकम्’ एक कालजयी रचना है। शायद यही वह संस्कृत रंग है, जिसे हिन्दी रंगमंच पर सबसे ज्यादा बार खेला गया है। कोई भी नया या पुराना निर्देशक इस रंग के मोह से छूट नहीं पाया। हबीब तनवीर ने ‘मिट्टी की गाड़ी’ के नाम से इसे अपने तरीके से खेला, तो संजय उपाध्याय ने भी इसमें अपना नया रंग भरा। इन दोनों निर्देशकों की खूबी यह रही कि उन्होंने इस रचना का ‘पुनर्पाठ’ किया और मंच पर ‘पुनर्सृजन’। हर कालजयी रचना नई सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक परिस्थितियों में ‘पुनर्पाठ’ और ‘पुनर्सृजन’ की मांग करती है और हर निर्देशक में ऐसा साहस भी नहीं होता कि इस मांग को पूरा करे। इसके अभाव में कोई कालजयी रचना एक साधारण रंग प्रस्तुति भर रह जाती है। पिछले वर्ष इप्टा के नाट्य समारोह में रामजीबाली के निर्देशन में मंचित ‘चारुदत्तम’ और कल मिर्जा मसूद के निर्देशन में खेली गयी ‘मिट्टी की गाड़ी’ इसी साधारणता की शिकार हुई है।

प्रेम हमारी कुदरत का एक प्राकृतिक रंग है। लेकिन हमारे साहित्य में यह प्रेम बहुतायत में राजमहलों तक ही कैद है। शूद्रक की खासियत यह है कि वह प्रेम के इस रंग को अट्टालिकाओं से मुक्त करके जनसाधारण की झोपड़ियों तक लाते हैं। लेकिन ‘मृच्छकटिकम’ केवल निर्धन चारूदत्त और गणिका वसंतसेना की प्रेम कहानी भर नहीं है, इसमें ‘निरंकुश सत्ता के एक असंवैधानिक केन्द्र’ के रुप में राजा के साले शाकार की उपस्थिति भी है, राजा का अत्याचार और भ्रष्ट तंत्र भी है और अत्याचारी राजतंत्र के खिलाफ एक सफल तख्तापलट भी। संस्कृत शास्त्र में एक सफल तख्तापलट के रंग, और वह भी जनसाधारण के विद्रोह के जरिये, बहुत कम देखने को मिलते हैं। प्रेम और विद्रोह के इस ताने-बाने ने ही ‘मृच्छकटिकम’ को कालजयी बनाया है।

शूद्रक ने जब ‘मृच्छकटिकम’ की रचना की थी, तो वह राजतंत्र का सामंती युग था। आज हम पूंजीवादी जनतंत्र में रह रहे हैं, जहां राजसत्ता पहले से ज्यादा निरंकुश और बलशाली है। आज केन्द्र की सत्ता को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ नाम की संस्था अपने बहुविषपायी भुजाओं से निर्देशित कर रही है और वह इसे छुपाने की भी कोशिश नहीं करती। यह सत्ता अपने संसदीय बहुमत के अहंकार से बहुमत जनसाधारण की आकांक्षाओं को दबाने का काम कर रही है और इस दमन को आसान बनाने के लिए उनके बीच सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का खेल भी खेल रही है। यह राजतंत्र की नहीं, पूंजी की निरंकुशता है, जो अपनी शोषण की सत्ता को जमाये रखने के लिए देश की सीमाओं से बाहर बहुराष्ट्रीय कार्पोरेटों के साथ गले मिल रही है और देशहित और जनहित के खिलाफ समझौते कर रही है। इसे किसी पुराने तरीके के जनविद्रोह के जरिये पलटा नहीं जा सकता। इस तख्तापलट के कमांडर, इसकी सेना, इसके हथियार, लड़ाई का मैदान, इसके विचार- सभी अलग तरह के होंगे। लेकिन इस सबके केन्द्र में वह जनसाधारण ही होगा, जो ‘इतिहास का निर्माता’ है। ‘मृच्छकटिकम’ का आधुनिक संदर्भ यही हो सकता है कि आज पूंजी की निरंकुशता, इसके अत्याचार और विभाजनकारी षड़यंत्रों के खिलाफ आम जनता को एकजुट किया जाये और एक वर्गविहीन, शोषणविहीन समाज की स्थापना की आधुनिक लड़ाई को आगे बढ़ाया जाये।

मिर्जा मसूद ‘मृच्छकटिकम’ का आधुनिक संदर्भ पेश करने का साहस नहीं कर पाये। यदि वह ऐसा साहस करते, जन साधारण के विद्रोह और तख्ता पलट के बाद शाकार को ‘जीवन दान’ नहीं मिलता। यह सभी जानते हैं कि फ्रांसीसी क्रांति के बाद राजा को गिलोटिन पर चढ़ा दिया गया था। लेकिन इस ‘जीवन दान’ के लिए मंच पर किसी गांधीवादी ‘हृदय परिवर्तन’ की उपस्थिति का आभास भी नहीं होता- तो सब कुछ के बाद जन साधारण के विद्रोह और तख्ता पलट का नकार और यथास्थिति को बनाये रखना ही है। यथास्थिति के खिलाफ लड़ने में ही किसी नाटक की सार्थकता खोजी जा सकती है।

जिन्होंने ‘मृच्छकटिकम’ पर आधारित दूसरे निर्देशकों की रंग प्रस्तुतियां देखी हैं, उन्हें यह रंग प्रस्तुति बहुत ही साधारण लगेगी- दिखे-दिखाये को फिर से दिखाने की कोशिश। जो रंगदर्शक पहली बार इस नाटक से रुबरू हो रहे थे, उनके रसास्वादन के लिए रंगों की कमी नहीं थी। डाॅ. जीवन यदु के गीतों ने रंग प्रभाव को सुगम और कर्णप्रिय बनाया, तो सुभाष धनकर के मेकअप में पात्रों का रंगाभिनय जमकर निखरा। हर्ष दुबे (चारूदत्त) वसंतसेना (संगीता निषाद), मैत्रेय (सिद्धार्थ मालवीय), मदनिका (मोना पवार) शाकार (तूफान वर्मा) आर्यक (अंकित चैबे), अधिकर्णिक (संतोष जैन) आदि के रंगाभिनय को सबने सराहा। अधिकांश नये कलाकारों के साथ 20-25 लोगों की टीम को साधना मिर्जा साहब के बस की ही बात हो सकती है। आखिरकार, नाट्य कर्म एक सामूहिक कर्म है और सामूहिकता को अपने पूरे रंग में मंच पर उपस्थित करना आसान बात नहीं होती। 

(लेखक की टिप्पणी- बतौर एक दर्शक ही)