Saturday, 25 July 2015

नसीब नहीं, जनता होत बलवान....


दिल्ली के चुनाव नतीजों से स्पष्ट है कि यदि आम जनता साथ छोड़ दें, तो भले ही संघी गिरोह के पास कितना भी मज़बूत संगठन हो, कितना ही चुनाव प्रबंधन का कौशल हो, भले ही कार्पोरेट पैसों की भरमार हो और मीडिया का यशोगान भी....लेकिन कुछ काम नहीं आता.
भाजपा की दुर्गति की यही कहानी है. आम जनता को भड़काने-भरमाने की कितनी कोशिशें नहीं की गई ! मुस्लिम समुदाय के खिलाफ कितना आग नहीं उगला गया और दंगे आयोजित किये गए !! चर्चों पर भी चुनावी अभियान के दौरान ही हमले जारी रहे. 'रामजादे-हरामजादे" का नारा लगाया गया और हिन्दुओं से 'धर्मरक्षा' के नाम पर चार से दस बच्चे पैदा करने का आह्वान किया गया. मोदी का चेहरा चमकाने ओबामा को लाया गया और अपने ही 'मेक इन इंडिया' के नारे को 'मेड इन यूएसए' बनाने में उन्हें कोई हिचक नहीं हुई. पर सब बेकार....!!! सीएम उम्मीदवार किरण बेदी तो हारी ही और बेचारी अपना कैरियर भी शुरू नहीं कर पाई, भाजपा तो नेता प्रतिपक्ष भी चुन पाने के काबिल नहीं रही. जो हाल लोकसभा में कांग्रेस का, वाही हाल भाजपा का दिल्ली में. जिस दंभ और अहंकार की नींव पर मोदी-भाजपा-संघी गिरोह खड़ा था, भरभराकर गिर पड़ा.
फेंकू महाराज, लच्छेदार भाषण दो और जनविरोधी नीतियां लागू करो, इससे देश और जनता का भला नहीं होने वाला. देश को नेता नहीं, नीतियों की ज़रुरत है, जो आम जनता की बुनियादी समस्याओं को हल कर सकें.
फेंकू महाराज, जनता को जो फुटबाल समझता है, जनता उसे फुटबाल बना देती है. अब भी समझ लो, नसीब बलवान नहीं होता, बलवान होती है जनता.

भागवत महाराज, इस फेंकू का कुछ इलाज करो भाई...!!


अरे पता करो कि इस संघी सेवक ने किस पेस्ट से मुंह धोया था कि संविधान, धर्मनिरपेक्षता , धार्मिक आस्था की स्वतंत्रता जैसे शब्द इसके मुंह से झड़ने लगे? क्या ओबामा की लताड़ काम आ रही है या दिल्ली चुनाव के नतीजों ने इसका दिमाग खराब कर दिया है?
यह वही आदमी है न, जिसने गुजरात के दंगों को 'क्रिया की प्रतिक्रिया' कहा था? यही वह आदमी है न ,जिसने 'वे पांच,उनके पच्चीस' के नारे लगाये थे?? इसी आदमी के मंत्रिमंडल में दंगाई और बलात्कारी भरे पड़े हैं न, जो आज भी उन्माद फैलाने में लगे हैं! साक्षी इसी की पार्टी का है न और प्राची भी इसी गिरोह की है न!! यह आदमी भी उसी उचक्के गिरोह का सदस्य है न, जिसने गांधीजी की जगह गोड़से की मूर्तियाँ लगाने का अभियान चला रखा है!!! यह वही गिरोह है न, जो धर्मनिरपेक्षता और धारा-370 पर बहस चलाने की मांग कर रहा है!!!!
पूरे देश में चर्चों पर हमले हुए हैं, तो किसने किये हैं? किसने ग्राहम स्टेंस और उसके मासूम बच्चों को जिन्दा जलाया था?? किसने बाबरी मस्जिद तोड़ी थी??? कौन कथित 'घर वापसी' को "चोरी का माल वापस लेने" जैसा बता रहा है???? फिर ये बददिमाग आदमी किस पर सख्त कार्यवाही करने की बात कर रहा है? ये संघी सेवक इन लोगों के खिलाफ कुछ कदम उठाएगा??...
अरे इसे छोडो. 10-12 दिन पहले चर्चों पर हमलों के खिलाफ जिस पुलिस ने शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर लाठियां चलाई थीं, क्या वह केजरीवाल की पुलिस थी?...और ज्यादा पीछे क्यों जाएं! इसी आदमी की सरकार ने भारत के संविधान के विज्ञापन में 'धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद' शब्दों को हटाया है न!!
बेचारा फेंकू बदहवास है. भागवत महाराज, जल्दी से इसका कुछ इलाज करो, वरना ये तो 'हिन्दू राष्ट्र' की लुटिया ही डुबो देगा!...और यदि लुटिया ही डूब गई, तो समझो न हिन्दुत्व बचेगा और न हिन्दुत्व के पैरोकार!! कुछ करो भाई, इस सिरफिरे परधानमंत्री का!!!

आओ कारपोरेटों, हम ढोयेंगे पालकी, यही हुई है राय संघी गिरोह की...


इस देश का बजट तो बनता ही है कार्पोरेटों द्वारा, कार्पोरेटों और विदेशियों के लिए. अतः उनसे क्या छुपाना! बजट की 'पवित्र' गोपनीयता तो पब्लिक के लिए होती है, सो लीक्ड बजट अब भी पब्लिक से गोपनीय है.इसी 'लीक्ड' बजट को कारपोरेटों के सरताज संसद में रखेंगे.यह वही संसद है, जिसमे घुसने से पहले फेंकू महाराज ने अपनी नाक रगड़ी थी और घुसने के बाद उसकी नाक काटते देर नहीं लगाई.
तो दोस्तों, जासूसी हो गई, तो हो गई. बजट लीक हो गया, तो हो गया. इसमें घबराने की क्या बात है! जिसके लिए लीक होना था, उसके लिए ही लीक हुआ. वे अब इस देश पर थोडा और दबाव डालेंगे कि अर्थव्यवस्था को पटरी पर रखने के लिए कुछ लाख करोड़ रुपयों की थोडा और रियायत दो, तो अर्थव्यवस्था की सेहत के लिए यह अच्छा ही है.पब्लिक को तो पता चल ही जायेगा. यदि उसके लिए लीक हो जाता, तो मांगती भी क्या वह?....माई-बाप, पेट्रोल-डीजल की कीमत कम कर दे! माई-बाप, मुझ पर लग रहे टैक्स के बोझ में कुछ हजार की राहत दे दे!! माई-बाप, चावल-गेंहू, दाल-शक्कर सस्ता कर दे!!! माई-बाप, मेरी पैदावार का समर्थन मूल्य दे दे!!!! माई-बाप, जमीन मत छीन, मुझे जमीन का पट्टा दे दे!!!!!....बताओ, यह भी कोई मांगना हुआ? ऐसी मांग तो वह 67-68 सालों से कर ही रही है, बजट के बाद फिर कर लेगी. इसके लिए इतनी हाय-तौबा क्यों?? उसके पास इतना जिगर कहां और कहां ऐसी मज़बूत छप्पर कि लाखों करोड़ की रियायत मांगे???
और जिस तरह यह बजट लीक होना था, उसी तरह हुआ, गरिमामय ढंग से, जासूसी के जरिये. वरना बताओ, बजट चोरी हो जाता, तो दुनिया में हम किसको मुंह दिखने लायक रहते? दुनिया हम पर हंसती नहीं कि देखो हम चोरी भी रोकने के काबिल नहीं!! अब हम कह सकते हैं कि जिस जासूसी पर अमेरिका का बस नहीं, वहां हम कौन होते है जासूसी रोकने वाले?....और हम तो बुला ही रहे हैं कारपोरेटों को, बुला ही रहे हैं ऍफ़डीआई और अमेरिका को कि आओ, हमारे घर में सेंध लगाओ. हम अपनी चोरी का माल वापस लेंगे, बदले में अपना पूरा घर सौंपेंगे.हम तो तुम्हारी पालकी ढोने के लिए ही पैदा हुए हैं. इसलिए आओ, तुम्हारी जासूसी और पलक-पांवड़े हमारे.
आओ रिलायंस, पूरा बजट तुम्हारा. आओ एस्सार, पूरा खजाना तुम्हारा. आओ केयन्स इंडिया, पूरा भारत तुम्हारा. आओ जुबिलेंट, पूरी एनर्जी तुम्हारी. तुम सब तो हमारे देश की आत्मनिर्भरता के प्रतीक हो, चाँद-तारे-सितारे हो. तुम्हीं सब तो हमारी पार्टी-फण्ड के अमूल्य स्रोत हो. न होता तुम्हारा फण्ड, न होती तुम्हारी प्रचार तंत्र की ताक़त, तो कहां रहते हम? इसलिए लो, तुम्हारे चरणों में यह बजट समर्पित.
जोर से बोलो-- संघी गिरोह की जय, कार्पोरेटों की जय-जय.

इन 'राजद्रोही' कार्पोरेट मालिकों को गिरफ्तार करो....


सवाल ये नहीं है कि यह दस हजार करोड़ का घोटाला है या दस लाख करोड़ का. असली बात ये है कि ये कार्पोरेट जासूसी है--पेट्रोलियम मंत्रालय से लेकर कोयला और बिजली मंत्रालय होते हुए रक्षा मंत्रालय तक फैला हुआ. थोड़ी और छानबीन हो जाएं, तो कोई भी मंत्रालय बेदाग़ नहीं बचेगा. और ये जासूसी इस देश की कार्पोरेट कम्पनियां ही कर रही है, जिनकी विदेशी पूंजी के साथ सीधी मिलीभगत है. इसलिए इस जासूसी से जो भी बातें लीक हुई है, वह विदेशी हाथों तक भी पहुंची ही होगी. हमारे ये 'देशभक्त' कार्पोरेट इस देश की सुरक्षा संबंधी गोपनीय तथ्यों को विदेशी हाथों को भी बेच रहे हैं.
और क्या यह संभव है कि ऐसी जासूसी इस देश की कार्पोरेट कंपनियों के मालिकों की जानकारियों के बिना हो रही है, जिन्हें इस जासूसी से हजारों करोड़ का सीधा फायदा हो रहा है? क्या ये केवल इन कार्पोरेट कंपनियों के मैनेजर, डीजीएम या सीनियर एग्जीक्यूटिव की ही सनक थी?? दस्तावेजों तक ये सेंधमारी क्या केवल कुछ कर्मचारियों का ही कमाल है???
देश की सुरक्षा और गोपनीयता से खिलवाड़ करने वाले इस जासूसी कांड का पर्दाफाश होना जरूरी है-- और यह तभी हो सकता है, जब इन कार्पोरेट मालिकों को भी गिरफ्तार किया जाएं और इन पर 'राजद्रोह' का मुक़दमा कायम किया जाएं. इनकी गिरफ़्तारी के बिना इस जासूसों कांड के तार बेनकाब नहीं हो सकते, इस कांड में जिन उच्चपदस्थ अधिकारियों व राजनेताओं की संलिप्तता है, वह सामने नहीं आ सकती है.
लेकिन लगता है कि कुछ छोटे पुर्जों को ही निशाना बनाकर पूरे मामले को ही रफा-दफा कर दिया जायेगा. कार्पोरेट पूंजी के बल पर टिकी मोदी सरकार और संघी गिरोह इससे ज्यादा कुछ नहीं कर सकती. इनकी कथित 'देशभक्ति' को यही पर तार-तार होता हुआ हम देख सकते हैं.

मौत बांटने वाली नीतियां


नव-उदारीकरण की नीतियां भूख का साम्राज्य स्थापित करती है. यह अनुभव सभी विकासशील देशों का है. भारत का भी यही अनुभव है. मोदी राज में इस अनुभव का केवल विस्तार हो रहा है. वे दीदादिलेरी से खैरात बांटने में व्यस्त है...और इधर किसान आत्महत्या करने के लिए मजबूर.
भूख से मरने की खबर अब छत्तीसगढ़ के किये भी नई नहीं रही. यह वही 'धान का कटोरा' है, जो आज राख के ढेर में तब्दील हो रहा है...और इसके लिए कांग्रेस-भाजपा सरकारों की अंधाधुंध औद्योगीकरण की नीतियां ही जिम्मेदार है. आज लगभग 2000 किसान आत्महत्या कर रहे है. इनमें आदिवासी हैं, दलित हैं और अन्य वर्गों के गरीब भी. ये सभी आत्महंता भूख के ही शिकार होते हैं. गांवों में चले जाइए, सरकारी रिपोर्ट की सच्चाई सर चढ़कर बोलेगी कि आधे से ज्यादा महिलायें और बच्चे कुपोषण के शिकार हैं. सभी एक धीमी मौत की ओर बढ़ रहे हैं.
इसलिए सरगुजा में एक बच्चे की भूख से हुई मौत में नया कुछ नहीं है. लेकिन बेशर्म भाजपा सरकार इसे स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है. पोस्टमार्टम रिपोर्ट चीख-चीख कर कह रही है कि बच्चे की मौत भूख से हुई. इतना भूखा था वह कि उसकी अंतड़ियां भी सूख चुकी थी. लेकिन प्रशासन है कि उसे लू से हुई मौत सिद्ध करने में लगा है. कल अखबारों के पन्नों पर यही बहस होगी कि बच्चे की मौत भूख से हुई या लू से? लू से हुई, तो यह ठीक वैसी ही प्राकृतिक आपदा है, जिसकी कहर में कुछ दिनों पहले 65 लोग गंभीर रूप से घायल हुए हैं और एक मजदूर की मौत भी. वे सब बेचारे मोदी की सभा के लिये डोम बनाने में लगे थे....लेकिन मोदी को इतनी भी फुर्सत नहीं थी कि घायलों को ही देख आते. और रमन सरकार तो कमिशनखोर भाजपाई ठेकेदार को बचाने में ही जुटी है.
सवाल फिर भी होगा कि ऐसी कौन सी मुसीबत थी कि बच्चे का पिता अपने बच्चों के साथ पलायन करने के लिए मजबूर हुआ? उसे गांव में ही उस मनरेगा में काम क्यों नहीं मिला, जिसका ढिंढोरा यह सरकार जोर-शोर से पीटती रही है? इस बच्चे के पेट में अन्न के इतने भी दाने क्यों नहीं थे कि लू से बचाव हो पाता, जबकि छत्तीसगढ़ की सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लिए कांग्रेस सरकार ने भी उसे पुरस्कृत किया था?
स्पष्ट है कि मोदी राज के एक साल में छत्तीसगढ़ में भी रोजी-रोटी के मामले में भयंकर गिरावट आई है. यह गिरावट सीधे केन्द्र की नीतियों से जुडती है, जो मनरेगा जैसे रोजगार पैदा करने वाली योजना को बंद करने का इरादा रखती है. फिर फण्ड आबंटन कहां होना है? प्रदेश के 40 लाख मजदूरों की पिछले वर्ष की मजदूरी बकाया है और इस वर्ष काम बंद है, तो केवल इसलिए कि फण्ड नहीं है. यह गिरावट सार्वजनिक वितरण प्रणाली से भी जुडती है, जहां गरीबों से जबरदस्ती राशन कार्ड छीन लिए गए हैं और जिनके पास हैं, उनमें से 50 लाख परिवारों को पिछले वर्ष की तुलना में कम अनाज दिया जा रहा है....और ऐसी सीधी गिरावट इसलिए पैदा की जा रही है कि बाज़ार में उछाल आये!! यही इस सरकार की अर्थनीति है, जिस पर पूरा कार्पोरेट जगत बल्ले-बल्ले है.
इसलिए गरीबों का विकास अलग होता है, अमीरों का विकास अलग. मोदी का 'विकास' उन अमीरों का विकास है, जो इस देश के गरीबों को रौंदकर हो रहा है. इसलिए गरीबों को अपना विकास करना है, तो मोदी के विकास, उसकी अमीरपरस्त नीतियों के खिलाफ लड़कर ही किया जा सकता है....और यही वर्ग-संघर्ष है, जिससे पूरे संघी गिरोह को चिढ है

छत्तीसगढ़: ‘संगठित अपराध’ में बदलता भ्रष्टाचार


केन्द्र व अन्य राज्य सरकारों के समान ही छत्तीसगढ़ में भी प्याज के छिलकों की तरह भाजपाई घोटालों की परतें खुल रही हैं और इसके छींटें मुख्यमंत्री व उनके परिवारों के दामन को दागदार बना रहे हैं। ‘भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टाॅलरेंस’ के वादे और दावे हवा-हवाई हो चुके हैं। ‘स्वच्छ प्रशासन’ का मुखौटा तार-तार हो चुका है। प्रशासन के जिस विभाग में हाथ डालो, घोटाला ही घोटाला। भ्रष्टाचार अब ‘संगठित अपराध’ में बदल गया है।
जिस कृषि संकट से छत्तीसगढ़ गुजर रहा है उसका पता केवल इससे ही चलता है कि पिछले 11 सालों के भाजपाई राज में 20 हजार से ज्यादा किसानों ने आत्महत्यायें की हैं। कारण बहुत ही स्पष्ट है-- मौसम की मार से फसल की बर्बादी, समर्थन मूल्य पर खरीदी न होना तथा ऋणग्रस्तता। लेकिन फसल बर्बादी का कोई मुआवजा किसानों को नहीं मिला, पर निजी बीमा कंपनियों ने हजारों करोड़ रुपयों का मुनाफा कमाया। धान खरीदी से लेकर मीलिंग तथा चावल वितरण तक नेताओं, ठेकेदारों, मिलरों व अफसरों- सबने खूब पैसा बनाया और भाजपा राज में 36 हजार करोड़ रुपयों के घोटालों की बात सामने आ रही है। इस घोटाले में पकड़ी गई डायरी में लिखी जानकारी के अनुसार, यह रकम ‘मैडम सीएम’ तक पहुंची है और इसी पैसे से पिछले विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस के एक उम्मीदवार को मैदान से हटाकर भाजपा के संघी कार्यकर्ता उम्मीदवार की जीत को सुनिश्चित किया गया। पूरी डायरी सार्वजनिक है, लेकिन कोर्ट में डायरी के चंद पन्ने ही पेश किये गये। जिन आरोपी अधिकारियों-कर्मचारियों के घरों से करोड़ों रुपये पकड़ाये, वे ‘सरकारी गवाह’ बना दिये गये हैं। एन्टी करप्शन ब्यूरो राज्य सरकार के तोते की तरह काम कर रहा है, जबकि इस सरकार के कम से कम दो दर्जन आईएएस, आईपीएस, आईएफएस अधिकारियों पर भ्रष्टाचर के आरोपों की जांच चल रही है, जिनके पास कम से कम 10-10 करोड़ की दौलत निकली हैं। इसी के साथ छ.ग. में भी एक ‘व्यापमं घोटाले’ के चिन्ह नजर आने लगे हैं।
मोदी सरकार की मंशा के अनुरुप इस वर्ष मनरेगा के काम पूरे प्रदेश में ठप्प हैं, लेकिन पिछले वर्ष की ही लगभग 45 लाख मजदूरों की 600 करोड़ रुपयों से अधिक की मजदूरी बकाया है। बकाया मजदूरी पिछले 6 माह से दो वर्ष तक की अवधि की है। अब पंचायतों के पदाधिकारी बदल गये हैं और काम करवाने वाले अफसर भी, इस बकाया मजदूरी के मिलने की कोई गारंटी नहीं है।
पीडीएस व्यवस्था में भयंकर कटौती हुई है और 40 लाख परिवारों को आज पहले के तुलना में प्रति परिवार कम अनाज मिल रहा है। 2 हजार करोड़ रुपयों की सब्सिडी यह सरकार बचा रही हैै आम जनता को कुपोषण के गड्ढे में धकेलकर। आदिवासी क्षेत्रों में जिस ‘मुफ्त’ नमक वितरण का शोर मचाया गया, वह घटिया, आयोडीनरहित, बदबूदार नमक साबित हुआ और खाद्य विशेषज्ञ इसे जहरीला बता रहे हैं। भाजपा राज में 7.71 लाख टन ऐसे नमक का वितरण किया गया है। यह पूरा घोटाला 7-8 सौ करोड़ रुपयों का है।
गांव में काम न मिलने, राशन में कटौती होने तथा भूमिहीनता-- यह सब मिलकर भुखमरी पैदा कर रहे हैं। सरगुजा व बिलासपुर जिलों से भूख से दर्दनाक मौतों की घटनायें सामने आई हैं।
जो बिजली प्रदेश सरकार 2.71 रुपये की औसत लागत से पैदा करती है, वह इसे 5.10 रुपये प्रति यूनिट की औसत दर से बेच रही है। इतना भारी मुनाफा कमाने के बाद भी बिजली कंपनियां घाटे का रोना रो रही हैं और सरकार खामोश है, तो मतलब साफ है कि घोटाला चालू आहे।
भूमि अधिग्रहण सबसे बड़ा मुद्दा बन रहा है। आंध्रप्रदेश में बन रहे पोलावरम परियोजना से 25 हजार लोगों के विस्थापित होने और समूचे सुकमा कस्बे के डूबने की आशंका है। उत्तरप्रदेश में कन्हर नदी पर बांध बनाया जा रहा है और छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले के 27 गांव प्रभावित हो रहे हैं। बस्तर में डिलमिली में लौह उद्योग स्थापना का प्रयास जारी है, जिसके लिए आदिवासियों को विस्थापित किया जाएगा। इस प्रस्तावित प्लांट क्षेत्र की 4 हजार एकड़ जमीन नेताओं-अफसरों-व्यापारियों ने पानी के भाव, 5 हजार रुपये प्रति एकड़, के भाव से खरीदकर रख ली है।
शिक्षा के युक्ति युक्तकरण के नाम से प्रदेश के 3 हजार सरकारी स्कूल बंद कर दिये गये हैं। अधिकांश स्कूल आदिवासी क्षेत्रों के हैं। 1.5 लाख बच्चे शिक्षा क्षेत्र से बाहर हो गये हैं। इनमें अधिकांश आदिवासी व छात्राएं हैं। इन क्षेत्रों में अब संघी स्कूलों को खोलने की तैयारियां की जा रही हैं, जो बच्चों को अवैज्ञानिक शिक्षा देने का ‘महान’ काम करेंगे।
प्रतिभाशाली आदिवासी बच्चों को सरकारी खर्च पर अच्छी शिक्षा देने की योजना का बड़ा ढोल पीटा गया, लेकिन उन्हें फर्जी निजी स्कूलों में भर्ती किया गया, जिनके मालिक इन बच्चों से अपने घर में बर्तन मंजवाने का काम करवा रहे हैं। राजधानी रायपुर में ही ऐसे तीन बच्चों को छुड़वाया गया है, जिन्हें बंधुआ बनाकर रखा गया था। ऐसे फर्जी निजी स्कूलों को प्रति छात्र 75 हजार रुपये फीस के रुप में दिये जा रहे हैं, जबकि यह निजी स्कूल आरटीई कानून तक लागू करने के लिए तैयार नहीं हैं।
साफ है कि छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार न केवल आर्थिक रुप से, बल्कि नैतिक रुप से भी भ्रष्ट साबित हुई है। लेकिन इसका विकल्प वामपंथी एकता पर आधारित जनसंघर्षों के विकास से ही विकसित हो सकता है। विकल्प होने के कांग्रेस के दावे को तो आम जनता लगातार तीन बार ठुकरा ही चुकी है।

बोलो, लेकिन आपस की बात है कि पोल न खोलो

बोलो, लेकिन आपस की बात है कि पोल न खोलो
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'एसोचैम' ने कहने के लिए कुछ न छोड़ा. पानी-पानी कर दिया उसने -- सरकार को भी, पार्टी को भी. इतना भी नहीं सोचा कि जिस सरकार के दावे की धज्जियां वह उड़ा रही है, उसे तो उन्हीं की प्रतिनिधि पार्टी चला रही है. आम जनता गरियाए तो समझ में आता है. गरीब बेचारे गरिया ही सकते हैं. रोना-धोना, चिल्ल-पों ही कर सकते हैं. बहुत हुआ तो धरना-प्रदर्शन. उनके गरियाने की हमें चिंता नहीं. चुनावी मौसम आने दो, फिर पटा लेंगे दारू-पैसे से. लेकिन ये उद्योगपति ! इन्हीं की चिंता में दुबले हुए जा रहे हैं, लोगों की लात-गालियां खा रहे हैं, लेकिन ये भी गरियाने पर उतर आये !! टैक्स चोरी के मौके दिए, टैक्स माफ़ किये. गरीब से जमीन छीनकर इनके चरणों में धर दिया. इनके मन-माफिक श्रम कानून बना दिए. बता दिया कि न कोई न्यूनतम मजदूरी होगी और न काम के घंटे तय होंगे. कह दिया कि काम करना है तो करो, विकास में भागीदार बनना है तो बनो, वर्ना छुट्टी !!! फिर भी ये अपने न हुए, पराये हो गए.हाय, ये भी उतर आये गरियाने पर. अब क्या अपना गला काटकर इन्हें दे दें?!
कह रहे हैं कि छत्तीसगढ़ में निवेश का वातावरण नहीं है. कागजों में ही काम हो रहा है. अधोसंरचना के विकास पर कोई ध्यान नहीं. बता रहे हैं कि कृषि क्षेत्र में गिरावट तो आई ही है, उद्योगों के साथ ही निर्माण व रियल स्टेट के क्षेत्र में भी गिरावट आई है. अरे भाई, जब कंट्री बिल्डिंग का काम आज तक कागजों में हो रहा है, तो स्टेट की प्लानिंग भी तो कागजों में ही बनेगी. पता नहीं, इन पूंजीपतियों को कागजों से क्यों इतना बैर हो गया है? बड़े-बड़े निर्माण कागजों में ही करके हमने इन पूंजीपतियों की जेब में डाले. अब भी पूरी-पूरी कोशिश कर रहे हैं कि गांठ से न जाये और तिजोरी में लबालब आये. इतना भी नहीं समझते कि कागजों के काम को पूरा करने लगे, तो न हम फूलेंगे, न ये फलेंगे. बस 'अधो-संरचना, अधो-संरचना' चिल्लाए जा रहे हैं.
आखिर बड़े लोगों की 'समझ' इतनी छोटी क्यों होती हैं? इन्हें इतनी भी समझ नहीं कि कृषि में विकास दर घटी नहीं है, घटाया गया है और इसे घटाने में हमने कितनी मेहनत की है. इसे घटाया ही इसलिए गया है कि ये लोग बढे. अब ये कह रहे हैं कि हमारे पास कोई नीति नहीं है. 'नीति-नीति' अभी तक केवल कम्युनिस्ट ही चिल्लाते थे, इसलिए कि उनके पास कोई नेता नहीं है. अब यदि 'एसोचैम' चिल्लाने लगे, तो दीवार पर सिर पटकने का मन करता है. क्या उन्हें पता नहीं कि हमारे पास नेता भी है और नीति भी. स्पष्ट नीति है हमारे पास -- दूरदृष्टि वाली, पक्के इरादे के नेता के साथ. कृषि भूमि कम होगी, तो रियल स्टेट का कारोबार बढ़ेगा. इससे निर्माण धंधों में तेजी आएगी. गांवों के किसान यदि मजदूर बनेंगे, तो इस धंधे में सस्ते मजदूर मिलेंगे. मजदूरी सस्ती होने से लागत कम होगी और मुनाफा भारी. खेती छोड़कर जब ये मजदूर बाज़ार में आयेंगे, तो मजदूरी देने में गँवाए पैसे भी घर में ही आयेंगे. इस बरकत से काले धन को भी सफ़ेद किया जा सकेगा -- कहीं निवेश के नाम पर, तो कहीं घाटे के कारखाने को फायदे में दिखाकर. कारखाने फायदे में दिखेंगे, तो शेयर के भाव भी खूब उछलेंगे. उछलते शेयरों से फिर हम सब अपनी तिजोरियां भरेंगे. तिजोरियां जितनी बड़ी होंगी, जल-जंगल, जमीन-खनिज पर उतना ही भारी कब्ज़ा होगा. धीमी पड़ी हुई परियोजनाएं आगे बढेंगी, रुकी हुई चलेंगी. इन परियोजनाओं के दौड़ने-चलने से ही देश का 'विकास' होगा.
चुनाव में भी हमने यही नारा दिया था -- विकास का. सो, हमारी सरकार विकास के लिए पूरा जोर लगा रही है. विकास बढेगा, तो देश बढेगा. यही हमारी स्पष्ट नीति है. इस नीति को आगे बढाने के लिए हम्मरे पास मोदी भी है और रमन भी. दोनों को आगे बढ़ाने के लिए संघ भी है और संघी दल भी.
सो एसोचैम के मालिकों, वामपंथियों-जैसे गिरावट का रोना न रोओ. देखो कि कमजोरी कहां रह गयी है. देखो कि कृषि घाटी, तो हमारा धंधा क्यों नहीं चमका? देखो और हमें बताओ कि काले धन के साथ ही विदेशी धन का आना कहां-कैसे रूक गया. कहीं काले धन ने ही तो गुस्सा होकर विदेशी निवेश को नहीं रोक लिया? दोनों में कहीं रिश्तेदारी तो नहीं?? रोओ-धोओ नहीं, हमें बताओ कि तुम्हारे लिए हमें और क्या-क्या करना है, कहां-कहां करना है, कहां-कितना-कैसे काला-पीला करना है??? आखिर हमारा-तुम्हारा जन्म-जन्मांतर का संबंध है. ये हम भी जानते हैं, तुम भी जानते हो. तुम जानते हो की हम तुम्हारे लिए ही बैठे हैं. हम भी जानते हैं कि तुम हमारे मालिक हो. मालिक को नाराज़ करके हम भला बढ़ सकते है? आखिर मालिक की बरकत में ही हमारी भी भलाई हैं. सो मालिकों, बोलो कि मोदी-रमन की इस जोड़ी को और क्या करना है???
बोलो, लेकिन आपस की बात है कि पोल न खोलो. पोल खुलने से वोट खिसकने का डर रहता है.