Saturday, 25 July 2015

नक्सलवाद का केवल कागजों में ही खत्म...

'इंडियन एक्सप्रेस' ने छत्तीसगढ़ में भाजपा की रमन सरकार की नक्सल-उन्मूलन में सफलता के दावों की पोल खोलकर रख दी है. इस रिपोर्ट के अनुसार--
--- जनवरी 2012-मई 2014 के बीच बस्तर में केवल 29 नक्सलियों ने सरेंडर किय
--- लेकिन जून-नवम्बर 2014 के बीच 377 नक्सलियों ने समर्पण किया. इसमें से अकेले नवम्बर में 155 नक्सलियों ने समर्पण किया और 26 नवम्बर को तो 63 नक्सलियों ने. ये सभी समर्पण एसआरपी कल्लूरी के बस्तर आईजी बनने के बाद हुए. उल्लेखनीय है कि बस्तर में जब भी कल्लूरी आते हैं, आत्म-समर्पण की बाढ़ आ जाती है.
--- इनमे से अधिकाँश लोग या तो सामान्य ग्रामीण हैं या साधारण अपराधी और किसी भी तरह से नक्सलियों की श्रेणी में नहीं आते. इसीलिए इनमे से किसी को समर्पण के बाद मिलने वाली मदद या पुनर्वास पैकेज नहीं मिला. इनमे से एक भी कथित नक्सली ने हथियारों के साथ समर्पण नहीं किया.
--- पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार, 100 से भी कम लोगों को 2-5 हजार तक की प्रोत्साहन राशि मिली. 10 से भी कम लोगों को चतुर्थ श्रेणी की सरकारी नौकरियां मिलीं.
--- जनवरी 2009-मई2014 के बीच समर्पण करने वाले 139 नक्सलियों में से एक को भी किसी तरह की कोई सरकारी मदद नहीं मिली.
अब इस रिपोर्ट को सीआरपीएफ के पूर्व महानिदेशक दिलीप त्रिवेदी के उस बयान के साथ जोड़कर पढ़े, जिसमें उन्होंने कहा है कि छत्तीसगढ़ सरकार की नक्सल-उन्मूलन में कोई वास्तविक दिलचस्पी नहीं है. उसकी दिलचस्पी तो केवल नक्सलियों से निपटने के नाम पर मिलने वाली रकम से है, जिसमें भयानक भ्रष्टाचार है. केपीएस गिल भी इसी तरह की बात कह चुके हैं.
स्पष्ट है कि नक्सलियों के नाम पर दमन का निशाना उन आदिवासियों को ही बनाया जा रहा है, जिनका नक्सलियों से दूर-दूर तक का कोई संबंध नहीं है. इन आदिवासियों को वनाधिकार क़ानून के तहत न तो जंगल-जमीन के पत्ते दिए गए हैं और न वनों पर इनके सामुदायिक अधिकारों को मान्यता दी गई हैं. मनरेगा में रोजगार गारंटी के लाभों से भी ये वंचित हैं. अनुसूचित क्षेत्र के संवैधानिक प्रावधानों को तो यहां लागू ही नहीं किया गया हैं. ...हां, इनकी बेदखली के लिए जरूर जोर-शोर से उपाय किये जा रहे हैं, ताकि बस्तर की बहुमूल्य प्राकृतिक संपदा को देशी-विदेशी पूंजीपतियों और कार्पोरेटों को आसानी से सौंपा जा सकें. इसीलिए नक्सल समस्या भी यहां जिंदा रखी गयी हैं.

..... तो ऐसा है देश का 'मॉडल राज्य' छत्तीसगढ़!!!


--- छत्तीसगढ़ में हो रही कुल आत्म-हत्याओं में लगभग 40% किसान.
--- महिलाओं के लिए देश के 10 सबसे असुरक्षित शहरों में छत्तीसगढ़ के दुर्ग-भिलाई (चौथा स्थान) और राजधानी रायपुर (सातवां स्थान) भी शामिल.
--- हाथ से मैला उठाने वालों में अब भी छत्तीसगढ़ शामिल.
--- छुआछूत मानने वालों में छत्तीसगढ़ के 48% आबादी शामिल.
--- आंखफोड़वा कांड, गर्भाशय कांड और नसबंदी काण्ड से लेकर स्मार्ट कार्ड घोटाले तक छत्तीसगढ़ की कुख्याति.
--- पिछले 13 सालों में 'टोनही' के 1300 से ज्यादा मामले,
--- मनरेगा, आदिवासी वनाधिकार कानून, पेसा और 5वीं अनुसूची के प्रावधान निष्प्रभावी, गरीबों की जमीन की खुली लूट, धान खरीदी बाज़ार के हवाले.
--- गली-मोहल्लों-गांवों में शराब की दुकानें, शराब की बढ़ती खपत व बढ़ती आय.
--- कोल ब्लाक आबंटनों में सुप्रीम कोर्ट के अनुसार भारी भ्रष्टाचार.
--- नवजात मृत्युदर में राष्ट्रीय औसत से ऊपर.
--- स्वच्छता के मामले में पूरे देश में 26वां स्थान.
--- 13 लाख परिवारों के पास आज भी बिजली नहीं.
--- 25% स्कूलों में शौचालय नहीं, 74% आबादी शौचालय सुविधा से वंचित.
--- 15 लाख से ज्यादा पंजीकृत बेरोजगार, रोजगार के अवसरों में कमी, रोजगार देने के मामले में देश में 17वां स्थान.
--- कैग की रिपोर्ट के अनुसार, सरकार के हर विभाग में भारी भ्रष्टाचार.
--- बलात्कार के मामलों में देश में 7वां स्थान.
--- सरकारी नीतियों के कारण आदिवासियों की प्रतिशत आबादी में गिरावट.
--- मानव विकास सूचकांक में निचले स्तर पर.
...... और भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह ने बताया छत्तीसगढ़ को देश का 'मॉडल राज्य'!!

फेंकू महाराज, ज़रा अपने गवर्नर की ही सुन लो...


रिज़र्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन ने निर्यात आधारित 'मेक इन इंडिया' की जगह घरेलू उपभोग में वृद्धि पर आधारित 'मेक फॉर इंडिया' का विकास मॉडल सुझाया है. फिक्की के व्याख्यान माला में उन्होंने कहा है कि एफडीआई को आकर्षित करने के लिए वह किसी भी हद तक जाने को तैयार नहीं हैं और इसके लिए देश के हितों के साथ समझौता नहीं किया जा सकता. निर्यात आधारित विकास की रणनीतिके खिलाफ बोलते हुए उन्होंने निर्यातकों को बेशुमार सब्सिडी देने का भी विरोध किया है और कहा है कि वर्त्तमान परिस्थितियों में विकास का यह मॉडल काम करने वाला नहीं है. इसकी जगह उन्होंने घरेलू बाज़ार के विस्तार पर जोर दिया है.
यही बात तो वामपंथ बार-बार कह रहा है. लेकिन घरेलू बाज़ार का विस्तार करना है, तो नवउदारवादी वैश्वीकरण की नीतियों से नाता तोडना होगा. 'मेक फॉर इंडिया' के मॉडल को स्थापित करना है, तो विकास की चिंता के केन्द्र में गरीबों को लाना होगा, कृषि क्षेत्र तथा समाज कल्याण की योजनाओं को बढ़ावा देना होगा, ताकि आम जनता की क्रय-शक्ति बढ़ें और औद्योगिक मालों की मांग बढे. लेकिन इसके लिए विदेशी कंपनियों और कार्पोरेटों के मुनाफों पर चोट करनी होगी.
फेंकू महाराज, वामपंथ की न सही, ज़रा अपने गवर्नर की ही सुन लो, तो देश का कुछ भला हो!!

पार्टनर, सांप्रदायिकता पर तुम्हारा रुख क्या है?




जिनके नामों को लेकर हवा बनाने की कोशिश की गई थी, वे नहीं आये। केदारनाथ सिंह, मंगलेश डबराल और वीरेन्द्र यादव ने सीधा बहिष्कार कर दिया, तो निदा फाजली अपना प्लेन ही नहीं पकड़ पाये। विष्णु खरे ने तो ‘पत्र बम’ ही फोड़ दिया। चंद्रकांत देवताले ने इस सरकार की सांस्कृतिक नीति पर ही सवाल खड़े कर दिये। भाजपा की नीतियों के प्रति राजेश जोशी की नीति तो जानी-पहचानी ही है, उनके आने का सवाल ही नहीं था। जब इतने सारे आमंत्रित ‘अनागत’ हो गये, तो महोत्सव की ‘महत्ता’ ही क्या रह गई?
लेकिन फिर भी जो आये, उनके आने के ‘लोकतांत्रिक अधिकार’ पर कोई सवाल नहीं। ‘लोकतंत्र’ कोई निरपेक्ष प्रणाली तो है नहीं। तो इस लोकतंत्र के साथ जो ‘अधिकार’ जुड़े हैं, उसके भी ‘निरपेक्ष’ होने का कोई सवाल नहीं। इन ‘अधिकारों’ का उपयोग और दुरूपयोग दोनों हो सकता है- व्यवहार में भी और तर्क प्रणाली में भी। इस तर्क में तो ‘दम’ है कि अंततः सरकारी पैसा आम जनता का ही पैसा होता है, इस पैसे को कुछ खास ‘जेबों’ तक ही क्यों जाने दिया जाये? लेकिन व्यवहार में सभी जानते हैं कि यह सरकारी पैसा ‘खास’ और ‘आम’ में फर्क नहीं करता, वह सबको ‘माल’ में ही बदलने का माद्दा रखता है। ... और जो ‘प्रगतिशील’ माल में ढलकर सरकारी गोदाम में जमा हो गये, वह उनका लोकतांत्रिक अधिकार था और निजी स्वतंत्रता भी। ‘असहमति का सम्मान’ के नारे से किसे गुरेज हो सकता है? यह अलग बात है कि यह नारा वो लोग दे रहे थे, जिन्होंने ‘असहमति’ को हमेशा बर्बर तरीके से कुचला है। इतिहास यह नहीं भूलेगा कि इन्होंने ही मुक्तिबोध की किताबें जलाई थीं और हबीब तनवीर के नाटकों में हंगामा किया था। आज भी वे ऐसा ही कर रहे हैं। आगे भी वे ऐसा ही करेंगे। इसलिए हमारा लोकतंत्र तो यही कहता है कि इस नारे के पीछे छुपे असली मकसद को पहचानो और उसको बेनकाब करो। यदि इस मकसद को पहचानते हुए भी इसको ‘बेनकाब’ करने की हिम्मत नहीं बची, तो समझो ‘सरकारी पैसा’ अपना काम कर गया!!
जिन लोगों ने इस महोत्सव का घोषित ‘बहिष्कार’ किया, उनकी ‘असहमति का सम्मान’ किस तरह किया गया, सब जानते हैं। इनकी लानत-मलानत करने की होड़ लगी थी- मंच पर भी और मंच के बाहर भी। एक ‘अन्तराष्ट्रीय कवि’ ने डबराल पर जिस भद्दे तरीके से अपनी बातें रखीं, मंडप में बैठे साहित्य प्रेमी उससे अवाक थे। जिन प्रतिष्ठित साहित्यकारों ने अपनी ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ का उपयोग किया, वे भी ऐसे ‘सरकारी साहित्यकारों’ के हमलों से बच नहीं पाये। एक महानुभाव ने तो अशोक वाजपेयी के खिलाफ ‘देशद्रोह’ का मुकदमा ही दायर करने की मांग कर डाली- हिन्दी पर उनके ‘राष्ट्रभाषा’ वाले विचारों पर। डाॅ0 कमल किषोर गोयनका (वे बस बेचारे ‘हिन्दू’ शब्द को उच्चारित नहीं कर पाये) भारतीय संस्कृति और परंपरा की ध्वजा लहराते नजर आये। ‘साहित्य की शुचिता’ का सवाल ‘स्त्री की यौन -शुचिता’ में बदल गया। (ध्यान रहे, हिन्दू संस्कृति में ‘पुरुषों की यौन-शुचिता’ पर बात करना अपराध है!) और वे मैत्रेयी पुष्पा को कोसने से बाज न आये, भारतीयता की उनकी ‘अधकचरी’ समझ के लिए। प्रेमचंद को ‘प्रगतिशील मूल्यों के वाहक’ की जगह ‘भारतीय संस्कृति’ के वाहक के रुप में स्थापित करने में उन्होंने कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। अगले साल, या फिर उसके अगले साल निश्चित ही, प्रेमचंद और गांधी- दोनों ‘हिन्दू संस्कृति की श्रेष्ठता ’ के परचम लहराते मिलेंगे। इसके बाद संघी गिरोह की उनकी सदस्यता भी पक्की हो जाएगी। ठीक उसी तरह, जैसे विवेकानंद, भगतसिंह और सरदार वल्लभभाई पटेल को उन्होंने ग्रस लिया है।
रास्ट्रीय स्तर पर शिक्षा, साहित्य, संस्कृति और मीडिया के प्रति भाजपा सरकार की क्या नीति है, यह किसी से छुपी हुई नहीं है। इतिहास को मिथकों और पौराणिक कथाओं से प्रतिस्थापित करने की कोशिशें हो रही हैं। विज्ञान भी इससे अछूता नहीं है और वेदों में वैज्ञानिक आविष्कार खोजे जा रहे हैं। उद्देश्य स्पष्ट है- आम जनता को वैज्ञानिक सोच और यथार्थवादी ऐतिहासिक दृष्टिकोण से काट दिया जाये और धर्म निरपेक्ष जीवन-दृश्टि की जगह हिन्दूवादी सांप्रदायिक मूल्यों को स्थापित किया जाये। वे अपनी सांप्रदायिक राजनीति को मजबूत करने के लिए इस देश की साझा संस्कृति, समन्वयवादी मूल्यों और बहुलतावादी जीवन-दर्शन के ताने-बाने को ही ध्वस्त कर देना चाहते हैं। केन्द्रीय सत्ता पर कब्जे के अवसर का उपयोग अब वे गुजरात के अपने प्रयोगों का पूरे देश में विस्तार करके करना चाहते हैं। मोहन भागवत का ‘हिन्दुस्तान और हिन्दू’ वाला बयान, सषमा स्वराज का ‘गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ’ बनाने की मांग, बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद अब ताजमहल को निशाने पर लेने की कोशिश, दंगे और धर्मांतरण- सब इसी मुहिम का हिस्सा है। भाजपा के इन प्रयोगों से छत्तीसगढ़ भी अछूता नहीं हैं।
जिन ‘प्रगतिशीलों’ ने पुरखौती मुक्तांगन में महोत्सव के लिए प्रवेश किया होगा, उनकी दृष्टि इस बात को देखने से नहीं ही चूकी होगी कि मुक्तांगन की दीवारों में छत्तीसगढ़ के इतिहास के नाम पर किन मिथकों को उकेरा गया है। वहां केवल राम जन्म की कहानी और बम्लेश्वसरी मैया के दर्शन ही होंगे। न शहीद वीरनारायण सिंह मिलेंगे, न गुण्डाधूर। ‘मुक्ताकाश’ की चैहद्दी पर भी ऐसी ही संस्कृति देखने को मिलेगी। भाजपा की संस्कृति नीति यही है।
फिर इस भाजपाई ‘महोत्सव’ में इतने ‘प्रगतिशीलों’ को आमंत्रण क्यों? कारण स्पष्ट है। साहित्य-संस्कृति के क्षेत्र में अभी वे सफर शुरू कर रहे हैं और ढूढ़ने से भी उनको ऐसे दक्षिणपंथी संस्कृतिकर्मी नहीं मिलने वाले, जो उनके आयोजन को ‘महोत्सव’ का रुप दे सकें। यदि उनको संस्कृति की इतनी ही चिंता होती, तो छत्तीसगढ़ राज्य गठन के 14 सालों बाद भी राजधानी एक सर्वसुविधा युक्त आॅडिटोरियम से महरुम नहीं होती। कारण स्पष्ट है- इसका उपयोग कहें या दुरुपयोग, करने वाले केवल ऐसे कला-समूह ही मिलेंगे, जो प्रगतिवादी मूल्यों को ही आगे बढ़ा रहे होंगे, न कि हिन्दुत्व के पोंगापंथ को। उनसे गलती केवल यह हुई कि उन्होंने जगदीश्वर चतुर्वेदी- जैसे दूसरे साहित्यकारों को पहचानने में गलती कर दी और केदारनाथ सिंह से मंगलेश डबराल तक को आमंत्रित कर बैठे, जिन्होंने उनकी कसीदाकारी करना तो दूर, महोत्सव के बहिष्कार की घोषणा ही कर दीे और इसका प्रचार भी। अब बेचारे पंडित जी ही, सबकी तरफ से भाजपा सरकार के लिए सोशल मीडिया में मोर्चा संभाले बैठे हैं। जो पंडित जी कल तक बहिष्कार करने वालों को उनका लोकतांत्रिक अधिकारी बता रहे थे, वे आज उन सबको ‘अलोकतांत्रिक’ सिद्ध करने पर तुले हुए हैं। ‘असहमति का सम्मान’ के आह्वान की असली पोल पूरी तरह से खुल गई है। इन पंडित जी के साथ, उदयप्रकाश का आलाप भी बढि़या जम रहा है, जिन्हें दंगाई योगी के हाथों पुरस्कार-सम्मान लेने में शर्म नहीं आई थी!!
छत्तीसगढ़ आज विध्वंस की पीड़ा झेल रहा है। लगभग 2000 किसान हर साल आत्महत्या कर रहे हैं। बेरोजगारी से पीडि़त आत्महत्या करने वालों की संख्या अलग ही होगी। ग्रामीण अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो रही है। पलायन, मानव तस्करी और बलात्कार कम नहीं हैं। टोनही से लेकर हर प्रकार के अंधविश्वास व पोंगापंथ फल-फूल रहे हैं। आंख फोड़वा कांड से गर्भाशय कांड और नसबंदी कांड तक हजारों गरीब नागरिकों के जीवन से सरकारी संरक्षण में केवल खिलवाड़ किया जा रहा है। इन जन विरोधी नीतियों ने छत्तीसगढ़ को ‘मृत्युगढ़’ में तब्दील करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। सरकारी संरक्षण में आदिवासियों की कथित ‘घर वापसी’ की मुहिम जारी है। माओवाद चरम पर है और माओवाद की आड़ में भ्रष्टटाचार और आदिवासियों का दमन भी चरम पर है। यहां के प्राकृतिक संसाधनों की बर्बरतापूर्वक लूट जारी है और ‘बंदूक की नोक’ पर उन्हें अपनी जमीन से अलग किया जा रहा है। सांप्रदायिक तनाव व धर्मांतरण की मुहिम के दंश से समाज विभाजित हो रहा है। हमारे समाज की इस पीड़ा से टकराये बिना कोई साहित्य-चिंतन-मनन सार्थक नहीं हो सकता। मुक्तिबोध और हबीर तनवीर सहित सभी मूर्धन्य संस्कृतिकर्मी इन्हीं सवालों से टकराते रहे हैं। लेकिन इस साहित्य ‘महोत्सव’ में शब्द-सर्जना की गर्जना तो थी, लेकिन क्या ‘समाज-चिंता’ की आंच भी कहीं थी? क्या धर्मनिरपेक्षता, सांप्रदायिकता, वैज्ञानिक सोच के संधान की कहीं थोड़ी सी भी झलक थी? भाजपा को तो वैसे ही इन विषयों से परहेज है। तो कला और साहित्य का सृजन महज ‘कला’ के लिए है या ‘जीवन’ के लिए? ‘समाज-चिंता’ और ‘जीवन-चिंता’ से कटकर किसी साहित्य-संस्कृति की साधना ‘कलावादियों’ को ही मुबारक हो सकती है।
साहित्य में ‘राजनीति की चर्चा’ से परहेज कोई अविचारित बात नहीं, बल्कि सुनियोजित ‘राजनीति’ है। यदि साहित्य को राजनीति के आगे चलने वाली ‘मशाल’ (प्रेमचंद) बनाना है, जो दंगाई को दंगाई और नंगाई को नंगाई कह सके, तो ‘राजनीति’ के इस मायने को ‘साहित्य’ में ढूढ़ा जाना जरूरी है, अन्यथा साहित्य, राजनीति का पिछलग्गू ही रहेगा।
यह आकस्मिक नहीं है कि जिस दिन छत्तीसगढ़ में भाजपाई सरकार अपने 11 वर्ष पूर्ण कर रही थी, उसी दिन अमित शाह का पर्दापण होता है और उसी दिन ‘साहित्य महोत्सव’ का आयोजन भी। यह महोत्सव ‘भाजपा की राजनीति’ की विजय को अप्रत्यक्ष तौर से रेखांकित कर रहा था। इस विजय के रेखांकन के लिए कमल छाप की टी-शर्ट लगाये भाजपा के कार्यकर्ता तीनों दिन महोत्सव में विचरण कर रहे थे। साहित्यकार समाज-चिंता, राजनीति-चिंता से परे अपनी साहित्य-साधना करते रहें, सांप्रदायिक राजनीति का हित इसी में छिपा है और भाजपाई साहित्य महोत्सव का असली मकसद भी यही था।
दिक्कत यही है कि साहित्य अपनी ‘प्रगतिशीलता’ में ही गतिशील होता है। साहित्य जिस सौंदर्य का सृजन करता है, वह सौंदर्य मनुष्य को मनुष्य के सुख-दुख से बांधता है। यह बंधन पूर्व जन्म का नहीं, वर्तमान का ही होता है। यह बंधन तर्क और विवेक का बंधन ही होता है। तर्क और विवेक का यह बंधन ही मनुष्य को उसके जाति, नस्ल, रंग, धर्म, भाषा आदि के पूर्वाग्रहों से मुक्त करता है। सांप्रदायिक राजनीति को पूर्वाग्रहों से मुक्त, तर्क और विवेक से लैस मनुष्य की जरूरत नहीं है।
क्या आपने कोई ऐसा साहित्य पढ़ा है, जहां दंगों को महिमामंडित किया गया हो, जबकि राजनीति का यथार्थ सड़कों पर इसे महिमामंडित करने से नहीं हिचकता। साहित्य में हमेशा दंगों की त्रासदी को ही रेखांकित किया गया है और मनुष्य को मनुष्यता की डोर से ही बांधा गया है लेकिन सांप्रदायिक राजनीति को जाति भेद से युक्त, नस्लीय श्रेष्ठता से गर्वोन्मत, धार्मिक उन्माद से ग्रस्त, भाषाई घृणा से लिथड़ा ऐसा ‘गोबर-गणेश’ चाहिए, जो दंगों को महिमामंडित कर सके। ऐसे ‘गोबर-गणेश’ हिटलर को भी चाहिए थे, संघी गिरोह को भी चाहिए। जर्मनी के हिटलर का फासीवाद एक नये रंग-रुप के साथ भारत में आगे बढ़ने की कोशिश कर रहा है- वैश्वीकरण के नये परिप्रेक्ष्य को अपने में समेटे हुए। यदि वह ‘असहमति का सम्मान’ की बात करता है, तो केवल इसलिए कि उसे थोड़ा समय चाहिए। इसलिए जगदीश्वर चतुर्वेदी-जैसे जो लोग संघ की कट्टरता और भाजपा की उदारता के बीच अंदरूनी संघर्ष का सिद्धांत पेल रहे हैं, वे खुद धोखे में है और सबको धोखा दे रहे हैं। संघी राजनीति यही चाहती है कि साहित्य अपनी ‘प्रगतिशील’ विचारधारा से कटकर ‘पोंगापंथ’ में घुस जाये और उसके ‘हिन्दू राष्ट्र’ के निर्माण में सहभागी बने।
ऐसे में जो साहित्यकार ‘महोत्सव’ से गदगद हैं और इसे औचित्य प्रदान करने के कामों में अपनी खुली भागीदारी निभा रहे थे, उन्हें सबसे पहले संघी गिरोह की करतूतों के बारे में अपने ‘पवित्र’ विचारों का खुलासा करना चाहिए। उन्हें यह भी याद रखना चाहिए कि विश्वरंजन के नेतृत्व में ‘सलवा जुडूम’ को औचित्य प्रदान करने का काम भी इसी सरकार ने किया था। मुक्तिबोध ने पूछा था- ‘‘पार्टनर, तुम्हारी पाॅलटिक्स क्या है?’’ जो ‘सरकारी साहित्यकार’ नहीं है, जो चिर-परिचित मुद्रा में आज भी सत्ता विरोधी तेवर के साथ साहित्य-साधना में लगे हैं, उन सबसे आज का समय पूछ रहा है- ‘‘पार्टनर, सांप्रदायिकता पर तुम्हारा रुख क्या है?’’ आपने महोत्सव में शामिल होकर साहित्य सेवा की, यह आपका लोकतांत्रिक अधिकार है। लेकिन प्लीज, इस लोकतंत्र की भलाई के लिए ही सांप्रदायिकता के प्रति अपना रुख भी स्पष्ट करो। लोकतंत्र और छत्तीसगढ़ में भाजपा की सांप्रदायिक नीतियों से त्रस्त जनता की आपसे अपेक्षा भी यही है।

भागवत महाराज, धर्म के धंधे से बाहर आओ भाई!!


"जवानों को जवानी जाने से पहले देश को हिन्दू राष्ट्र बना दिया जायेगा. ...हम घुसपैठिया नहीं है. यह हमारा हिन्दू राष्ट्र है. हिन्दू अपनी जमीन नहीं छोड़ेगा. हमने पूर्व में जो खोया है, उसे वापस पाने की कोशिश करेंगे. ...पाकिस्तान भी विभाजन के पहले भारत का हिस्सा रहा है. ...हिन्दू जाग रहा है."
ये क्या अंट-शंट बक रहा है? न इतिहास-बोध, न वर्तमान ज्ञान!! केवल 'हुआं-हुआं' चिल्लाने से तो 'हिन्दू राष्ट्र' बनने से रहा, देखने की बात तो दूर!! इस बेचारे की तो जवानी ही बेकार हो गई.
लेकिन इस बेचारे को यह भी पता नहीं कि आदिकाल से अब तक दुनिया का भूगोल बदलता ही रहा है--कभी सीमाएं स्थायी नहीं रही. कभी आर्यावर्त था, जिसका विस्तार अफगानिस्तान से श्रीलंका तक था--आज कहां हैं? कभी भारत, पाकिस्तान, बंगलादेश मिलकर हिंदुस्तान बनाते थे--आज कहां हैं? पाकिस्तान भी दो टुकड़े हो गया, तो क्यों??
बेचारा केवल 'हिन्दू-हिन्दू' चिल्लाना ही जानता है, सामान्य समझ से भी इसका कोई लेना-देना नहीं हैं.पाकिस्तान को फिर से भारत में मिलाकर 'हिन्दू राष्ट्र'बनाएगा, तो इस 'काल्पनिक संयुक्त राष्ट्र' की 50 करोड़ गैर-हिन्दू जनता का क्या कत्ले-आम किया जायेगा? या फिर इन्हें इंग्लैंड, अमेरिका, ईरान, इराक में भिजवा दिया जायेगा?? या फिर गोलवरकर के मन्त्र पर अमल किया जायेगा कि इन सभी गैर-हिन्दुओं को नागरिक आधिकारों से वंचित करके हिन्दुओं का गुलाम बना दिया जायेगा?... और ये सभी गैर-हिन्दू चुपचाप सर झुकाकर भागवत महाराज के आदेश को शिरोधार्य कर लेंगे!!
भागवत महाराज, 'हिन्दू-हिन्दू' चिल्लाने से संघी गिरोह को टीआरपी बढ़ सकती है, देश की समस्याओं का हल नहीं निकल सकता. और देश कोई टीवी सीरियल नहीं है कि आप अपनी टीआरपी बढ़ाने का काम करें. ऐतिहासिक सच्चाई तो यही है कि तुम यहां केवल घुसपैठिया हो, आर्य यहां केवल बाहर से ही आये थे, यहां से अनार्यों को तुम्हारे पूर्वजों ने ही भगाया था. ...और वर्त्तमान ऐतिहासिक सच्चाई भी यही है कि आर्य-अनार्य संघर्ष के बाद एक साझा संस्कृति, एक गंगा-जमुनी तहजीब भी विकसित हुई. इस संस्कृति का विकास मेहनतकशों ने किया है, उसका सम्मान करना सीखो, सहिष्णुता और सद्भाव की इस संस्कृति को आगे बढ़ाना सीखो. अपने कंधे पर बैठे 'हिन्दू राष्ट्र के प्रेत' को उतारो, वरना तुम ही नहीं रहोगे, 'हिन्दू राष्ट्र' बनना तो दूर रहा!!
भागवत महाराज, जवानी में दम है तो आधुनिक भारत के 'निर्माता' बनो, 'तुगलक' तो कोई भी बन सकता है!!

नसबंदी शिविर में 13 मरे, 70 मरणासन्न -- "तो मंत्री क्या करे?" !!


--- यदि हॉस्पिटल 4 माह से बंद था, तो मंत्री क्या करे!
--- यदि ऑपरेशन थिएटर औए औजार संक्रमित थे, तो मंत्री क्या करे!!
--- यदि दवाएं कालातीत थीं, तो मंत्री क्या करे!!!
--- यदि दवाईयों की खरीदी में मंत्री के आदमी ने ही दलाली खाई थी, तो मंत्री क्या करे!!!!
--- यदि सबूत नष्ट करने के लिए दवाईयां पीड़ितों से वापस लेकर जला दी गई, तो मंत्री . क्या करे!!!!!
--- यदि 25 मिनट का ऑपरेशन 2.5 मिनट के औसत से ही कर दिया गया, तो मंत्री . क्या करे!!!!!!
--- मृतकों के शवों को घर ले जाने के लिए यदि हॉस्पिटल ने वाहन नहीं दिए, तो मंत्री . क्या करे!!!!!!!
--- यदि नसबंदी करवाने वाली महिलाओं को 1400 रुपयों की जगह 600 रूपये ही दिए . गए, तो मंत्री क्या करे!!!!!!!!
'' तो मंत्री क्या करे? "-- यह बचाव है मुख्यमंत्री रमन सिंह का, अपने स्वास्थ्य मंत्री अमर अग्रवाल के लिए !!....लेकिन फिर भी मोदी के कहने पर उसने अपनी ' नैतिक जिम्मेदारी ' तो स्वीकार कर ली, 4 को निलंबित कर दिया, एक के खिलाफ एफआईआर दर्ज हो गई -- और क्या चाहिए? जांच समिति तो बन गई -- अब क्या मृत महिलाओं को जिंदा कर दें? 4 लाख रुपयों के ' भारी-भरकम ' मुआवजे की भी घोषणा हो गई -- और क्या करें सरकार??
खामोश, सरकार काम कर रही है. अब आप लोग इतनी भी ' अनैतिकता ' न दिखाएँ कि 'नैतिकता ' के आधार पर मंत्री के इस्तीफे की ही मांग करने लग जाएं. क्या ' आंखफोड़वा' और ' गर्भाशय ' काण्ड के बाद हमारे इस बहादुर मंत्री ने इस्तीफ़ा दिया था?
मौत तो जीवन-चक्र का हिस्सा है. हमारे शास्त्रों में कहा गया है -- शरीर मरता है, आत्मा नहीं. आत्मा अपना चोला बदलकर फिर जनमती है. कृपया मरे हुओं के ' पुनर्जन्म ' का इंतज़ार करें और संघी सरकार को सूचित करें. वह आत्मा के पुनरुद्धार की ख़ुशी में मिठाईयां बांटने का इंतजाम भी करेगी !!

त्रिवेदीजी, बहुत सस्ते में टिकट मिली भाई आपको...!!!


रायपुर के एक नागरिक-यात्री एन. त्रिवेदी की शिकायत है कि रायपुर-पुणे की तत्काल टिकट डायनामिक प्राइसिंग के कारण उन्हें 1793 रूपये में मिली, जबकि नार्मल तत्काल का किराया 690 रूपये ही है. लेकिन त्रिवेदीजी बड़े भाग्यशाली हैं कि उन्हें बड़े सस्ते में टिकट मिल गई. यदि वे और थोड़ी देरी करते, तो उन्हें यह टिकट 5000 रूपये में भी मिल सकती थी...यानी जितने पैसे उन्होंने 3 टिकटों के लिए दिए हैं.
असल में मोदी-गौड़ा ने तत्काल के लिए जो नियम निर्धारित किये हैं,उसके अनुसार डायनामिक प्राइसिंग के अंतर्गत आने वाले तत्काल कोटे की हर 10% सीटों पर 20% किराया बढ़ना है. याने, अब उपलब्ध कुल सीटों को 10 भागों में बांटा जायेगा और हर भाग की सीटें पहले के भाग की कीमतों से 20% अधिक दाम पर बेचीं जाएगी. चक्रवृद्धि ब्याज का फार्मूला लागू करने से ही आपको पता चल जायेगा कि अंतिम सीट किसी यात्री को 6 गुना से ज्यादा कीमत पर ही मिलेगी.
सूत्र यह है : M = P (1 + r/100) घात n यहां r =20, n = 10 रखने पर
M = 6.2 P .....याने मूल नार्मल तत्काल का 6.2 गुना.
यदि किसी पाठक-मित्र को यह फार्मूला समझ में नहीं आ रहा है, तो इसे यों समझें :
मान लीजिये, डायनामिक प्राइस के अंतर्गत 10 सीटें उपलब्ध है, तो हर सीट पर किराया 20% बढ़ जायेगा. तो अंतिम 10वीं सीट पर किराया इस प्रकार बनेगा, यदि नार्मल तत्काल किराया 690 रूपये हैं :
सीट क्र. .......20% वृद्धि के साथ किराया.......... क्र. .....20% वृद्धि के साथ किराया
1 ................830 .....................................6 .............2070
2 ................995......................................7 .............2485
3 ..............1195................ .....................8 .............2985
4 ..............1435 .....................................9 ..............3585
5 ..............1725....................................10 ..............4300
उक्त किराया 5 के गुणांकों में लिया गया है. अंतिम सीट पर किराया नार्मल तत्काल किराये का 6.2 गुना देना पड़ेगा और इस पर दूसरे टैक्स और लगाये जायेंगे.
इस फार्मूले के साथ ही फेंकू महाराज ने एक और नियम लागू किया है कि तत्काल टिकट 500 किमी. से कम दूरी के लिए नहीं मिलेगी. पहले यह दूरी 200 किमी. थी. याने यदि आपको रायपुर से नागपुर जाना है, तो भोपाल तक की टिकट तो खरीदनी ही पड़ेगी.
इस गणित को जानकर मेरे एक मित्र ने कहा कि उसे चक्कर आ रहा है. भाई साहब, फेंकू महाराज आम जनता को विमान में भले ही ना बैठा सकें, लेकिन उसे हवाई चक्कर तो खिला ही सकता है !!!