Saturday, 25 July 2015

‘मृत्युगढ़' में तब्दील होता छत्तीसगढ़


छत्तीसगढ़ एक बार फिर राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में है। इस बार भी कारण वही है-- बदहाल स्वास्थ्य सेवाएं। पिछले दो सालों से यह कभी ‘आंखफोड़वा कांड’ के कारण सुर्खियों में रहा है, तो कभी ‘गर्भाशय कांड’ के कारण। वर्ष 2011-12 में कवर्धा, बालोद, दुर्ग और बागबहरा के नेत्र शिविरों में एक के बाद एक भयावह ‘आंखफोड़वा कांड’ उजागर हुए। भयावह इसलिए कि इन शिविरों में जिन लोगों को लाया गया था, उनमें से अधिकांश संक्रमण का शिकार हुए और 88 लोगों की आंखों की रोशनी हमेशा के लिए चली गई तथा 6 लोग मारे गए। कारण-- संक्रमित औजार और आॅपरेशन थियेटर तथा घटिया या नकली दवाइयां। इसी बीच गर्भाशय कांड भी सामने आया और सरकारी दावों के विपरीत छत्तीसगढ़ में कार्यरत जन स्वास्थ्य अभियान का दावा है कि कम से कम 7000 महिलाओं के गर्भ निकाल लिए गए। कारण-- निजी चिकित्सकों और अस्पतालों को स्मार्ट कार्ड योजना में सेंध लगाकर मुनाफा कमाने का लालच। इन्हीं दो सालों में डेंगू और मलेरिया से राज्य में 47 लोगों के मरने के सरकारी आंकड़े हैं। पीलिया से भी 81 मौतें हुई हैं, जिनमें से 67 लोग राजधानी रायपुर में ही मरे हैं और इनमें से आधी गर्भवती महिलाएं ही थीं।
और अब नसबंदी कांड । कारण फिर वही-- संक्रमित औजार और आॅपरेशन थियेटर तथा नकली दवाइयां। राज्य के शिविरों में 18 जानें ही नहीं गई हैं, कई मासूम अनाथ हो गये और कई परिवार तबाह। इस तबाही के बदले 6 लाख मुआवजे की घोषणा कर भाजपा सरकार ने अपने कर्तव्य की ‘इतिश्री’ कर ली है। दिखावे के लिए एक न्यायिक जांच की घोषणा भी हो गई, लेकिन इस जांच का जिम्मा भी हाईकोर्ट के किसी वर्तमान या निर्वतमान जज को देने की हिम्मत सरकार ने नहीं दिखाई। कुछ डाॅक्टर बर्खास्त और कुछ निलंबित हैं।... और स्वास्थ्य सेवा संचालक को पदोन्नति भी दी गई है!!
इस स्वास्थ्य संचालक की ‘कीर्ति’ भी किसी से छिपी नहीं है। यह वह स्वास्थ्य संचालक है, जिसके कार्यकाल में टेंडर में गड़बड़ी करके और कोर्ट को गुमराह करके हिसार, हरियाणा की दवा निर्माता कंपनी रिगेन लेबोरेटरीज से करोड़ों की दवा खरीदी गई और बाद में जांच में यह पाया गया कि प्रसूति के समय महिलाओं को दिये जाने वाले इंजेक्शन आॅक्सीटाॅक्सीन में दवाई नहीं, बल्कि डिस्टिल्ड वाटर भरा हुआ था। इस कंपनी पर प्रतिबंध लगाने के बजाय फिर इस ‘यशस्वी’ संचालक ने इसी कंपनी से लिग्नोकेन नामक इंजेक्शन खरीदा है, जिसका उपयोग पेंडारी के नसबंदी शिविर में महिलाओं पर किया गया था।
लेकिन नसबंदी के बाद महिलाओं को खाने के लिए जो सिप्रोसीन नामक दवा दी गई, उसमें तो चूहामार दवाई जिंक फास्फेट ही मिला हुआ था, जो सीधे किडनी और आंतों को ही नुकसान पहुंचाता है। इस बात का खुलासा स्वास्थ्य विभाग के सचिव डाॅ. आलोक शुक्ला ने खुद एक प्रेस वार्ता में किया है। यह ‘जहर’ महावर फार्मा बनाती थी, जिसका कारखाना तमाम नियम-कायदों को धता बताकर राजधानी रायपुर के ही पाॅश एरिया में लगा हुआ है। जहर बेचने वाले इस कारखाने को ‘गुड मेन्युफेक्चरिंग सर्टिफिकेट’ जारी किया गया है!! साफ है कि सरकारी संरक्षण में संचालक की मेहरबानी के बिना यह संभव ही नहीं था। इसी से यह भी साफ हो जाना चाहिए कि उन्हें ससम्मान पदोन्नति क्यों दी गई? इस सरकार को जवाब देना चाहिए कि पिछले दो सालों में सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं में गड़बड़ी के कारण जो 150 मौतें हुई हैं, उसका जिम्मा लेने से वह कैसे इंकार कर सकती है?
तो छत्तीसगढ़ ‘मृत्युगढ़’ में तब्दील होता जा रहा है, तो संघ संचालित भाजपा सरकार की नीतियों का उसमें अच्छा-खासा योगदान है। और कुछ हो या न हो, मृत्यु दर के मामले में छत्तीसगढ़ का देश में तीसरा स्थान है। मृत्यु दर का राष्ट्रीय औसत आंकड़ा जहां 7 है, वहीं छत्तीसगढ़ में 8 है। थोड़ा और गहराई में जायें, तो पता चलेगा कि राष्ट्रीय औसत की तुलना में छत्तीसगढ़ के ग्रामीण क्षेत्रों में मृत्यु दर 12 प्रतिशत अधिक है, तो महिलाओं में 19 प्रतिशत और बच्चों में 15 प्रतिशत अधिक। स्पष्ट है कि सरकारी नीतियों की मार ग्रामीणों पर, महिलाओं और बच्चों पर ही अधिक पड़ रही है और इसमें भी उन तबकों पर जो सामाजिक-आर्थिक रुप से वंचित हैं-- यानि समग्र रुप से गरीबों पर और विषेश रुप से दलितों और आदिवासियों पर ही।
और यह सरकारी नीतियां क्या हैं, जो छत्तीसगढ़ को ‘मृत्युगढ़’ बनाता जा रहा है? यह नीतियां हैं स्वास्थ्य सेवाओं को सार्वजनिक क्षेत्र से निकालकर निजीकरण के दायरे में धकेलने की, आम जनता को चिकित्सा-बाजार की लूट और मुनाफे के सामने विकल्पहीन छोड़ने की और विकल्पहीनता के नाम पर निजी चिकित्सा बाजार को वैध जामा पहनाने की। सभी समझते हैं कि निजीकरण लूट पर आधारित अधिकतम मुनाफा कमाने की व्यवस्था का ही नाम है।
छत्तीसगढ़ जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि प्रदेश में 56 लाख परिवार रहते हैं। पिछले 6 सालों में 8.82 लाख लोगों की नसबंदी का लक्ष्य रखा गया है। क्या यह लक्ष्य ‘अमानवीयता’ की हद को छूता नहीं लगता कि इस प्रदेश के छठे हिस्से का बधियाकरण करने की मुहिम चलाई गई है? वर्ष 2009-10 से 2013-14 के दौरान 4,35,631 लोगों की नसबंदी की गई, जो कि कुल लक्ष्य का लगभग आधा है। लेकिन फिर भी नसबंदी के आंकड़े राष्ट्रीय स्तर की तुलना में बहुत ज्यादा हैं। इसके बावजूद वर्ष 2014-15 के लिए 1.70 लाख नसबंदियों का लक्ष्य रखा गया है और नवम्बर तक 54000 से अधिक नसबंदियां भी की जा चुकी हैं। अब अगले 4 माह में 1,16000 नसबंदियां की जानी हैं-- यानि आधे समय में दुगुना से ज्यादा काम । तो डाॅक्टर इंसानों के साथ जानवरों जैसा- ट्रीटमेंट नहीं, तो और क्या करेगा? यही बिलासपुर के जिला सर्जन डाॅ. आर.के. गुप्ता ने किया है-- पेंडारी के शिविर (बंद अस्पताल के बंद आॅपरेषन थियेटर) में ढाई मिनट में एक नसबंदी ! इतनी तेजी से तो दुकानों में मुर्गे भी नहीं कटते होंगे!! लेकिन डाॅ. गुप्ता की इसी रफ्तार पर तो रीझकर भाजपा सरकार ने उन्हें इसी वर्ष 'राष्ट्रपति अवार्ड’ से सम्मानित किया था!!! इस अवार्ड के लिए उन्होंने कितने लोगों की बलि चढ़ाई होगी यह तो फिलहाल रहस्य ही है। फिर जनसंख्या नियोजन के महान काम में कैसे औजार हैं, कैसा आॅपरेशन थियेटर है, कौन सी दवाई है, इन छोटी-मोटी बातों को जानने-समझने की फुरसत किसे हो सकती है? लक्ष्य है जनसंख्या नियोजन का-- जो हो तो रहा है: ऐसे भी और वैसे भी!! इस लक्ष्य पूर्ति का सबसे आसान निशाना ग्रामीण जनता और महिलायें ही होती हैं, जिन्हें डरा-धमका-ललचा कर, भेड़-बकरियों की तरह हांककर सरकारी शिविरों तक लाया जा सकता है।
इन शिविरों में प्रशासन को यह भी देखने की फुरसत नहीं होती कि जिन ग्रामीणों को लाया गया है, उनकी शारीरिक स्थिति क्या है या वे किस समुदाय के हैं? उन्हें तो संरक्षित जनजाति बैगा का नसबंदी आपरेशन करने से भी हिचक नहीं है। छत्तीसगढ़ में रहने वाले इन बैगा आदिवासियों को मध्यप्रदेश का प्रशासन भी आकर उठा ले जाता है-- अपनी नसबंदी का लक्ष्य पूरा करने के लिए। यह बैगा आदिवासी प्रशासनिक टारगेट का आसान निशाना बन गये हैं।
और मौत का यह खेल क्यों खेला जा रहा है? केवल इसलिए कि प्रदेश के कम से कम 1500 करोड़ रुपयों के चिकित्सा-बाजार में नेता से लेकर ठेकेदार तक और डाॅक्टर से लेकर दलाल तक अपने-अपने हिस्से की ज्यादा से ज्यादा लूट कर सकें। बाकी जनता जाये भाड़ में! छत्तीसगढ़ में 3600 करोड़ रुपयों से ज्यादा का दवाईयों का कारोबार है, जिसका 40 प्रतिशत से ज्यादा ‘अवैध’ श्रेणी का है। नशीली दवाईयों, नकली दवाईयों और जहर की भी इस बाजार में कमी नहीं हैं। वर्ष 2012-13 में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन ने राज्य सरकार को 1006 करोड़ रुपयों से अधिक आबंटित किए थे। पिछले 8 सालों में मिशन ने वास्तव में 3325 करोड़ रुपये आबंटित किए हैं। यह अलग बात है कि राज्य सरकार इसमें से केवल 2015 करोड़ (61प्रतिशत) ही खर्च कर पाई। प्रदेश का स्वास्थ्य बजट भी लगभग 2700 करोड़ रुपयों का है। प्रदेश के केवल आधे परिवारों का ही सरकारी बीमा योजना तक पहुंच हो, तब भी यह लगभग 9000 करोड़ रुपयों का खेल है। फिर इस खेल में महिलाओं के गर्भ निकालकर ही मुनाफा कमाया जाये, तो इसमें अनैतिक क्या है?
अनैतिक तो तब भी नहीं था, जब भाजपा सरकार ने सुपर स्पेशिलिटी हाॅस्पिटल और निजी नर्सिंग होम शुरु करने के लिए एक रुपये की टोकन कीमत पर शहरी क्षेत्रों में 2 एकड़ तथा ग्रामीण क्षेत्रों में 5 एकड़ जमीन देने के लिए नीति बनाई है, जबकि सरकार की ही रिपोर्ट के अनुसार छत्तीसगढ़ में डाॅक्टरों में 1516, स्टाफ नर्स के 1780, एएनएम के 398, फार्मासिस्ट के 450 पद खाली हैं। प्रदेश के 350 अस्पताल चिकित्सक विहीन हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार 100 से ज्यादा सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र, 29 प्रतिशत प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र तथा 38 प्रतिशत उप स्वास्थ्य केन्द्र या तो भवनविहीन हैं या किराये में चल रहे हैं। सरकारी अस्पतालों में जांच की सुविधायें नहीं हैं और यदि हैं तो चिकित्सा उपकरण ‘सुनियोजित’ तरीके से बिगड़े पड़े हैं। दवायें हैं नहीं, और हैं तो घटिया, जिसका शरीर पर कोई असर नहीं होता। सरकारी डाॅक्टरों का ज्यादा ध्यान अपने निजी अस्पतालों पर ही होता है। इस तरह सरकार की कार्पोरेटी नीतियां ही बीमारों को बाजार में धकेल रही हैं और गरीब आदमी के लिए नीम-हकीम ही भगवान हैं। सरकारी व्यवस्था तो उसके लिए ‘यमराज’ बन गई है।
लेकिन यदि सरकारी पैसों के बल पर निजी क्षेत्र को विकसित किया जाएगा, तो पूरे छत्तीसगढ़ की स्वास्थ्य व्यवस्था को चौपट तो होना ही है। नागरिकों के जीवन से खिलवाड़ होता रहेगा और खिलवाड़ करने वालों को बचाया भी जाता रहेगा। आंखफोड़वा कांड और गर्भाशय कांड में किसी के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं हुई। जहरीली दवाओं और घटिया उपकरणों की बिक्री-खरीदी करने वाले खुलेआम घूम रहे हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ एफआईआर दर्ज हो भी जाए दिखावे के लिए, तो चुपचाप वापस ले ली जाती हैं। नसबंदी कांड के सुबूत तेजी से मिटाये जा रहे हैं और जांच में न डाॅक्टर जिम्मेदार पाये जायेंगे और न नकली दवा बनाने-खरीदने वाले। फिर कोई कांड होगा और हल्ला होगा, तो मुआवजा थमा दिया जाएगा, क्योंकि यह मुआवजा मुनाफे पर कोई चोट नहीं पहुंचाता। मुनाफे की कीमत पर मुआवजे का नुकसान सहा जा सकता है। यह मुआवजा भी मुनाफाखोरों की जेब से नहीं जाना है, सरकारी तिजोरी और जनता की जेब से ही जाना है।
और जब जनता की ही जेब से जाना है, तो फिर भेदभाव क्यों? पिछले दो सालों में सरकारी की नीतियों से मरे उन 130 लोगों ने क्या कुसूर किया था, जो 6 लाख के मुआवजे से वंचित रह गये? क्या सरकार मरे हुए लोगों के भूतों की तरह नाचने पर ही मानेगी?
छत्तीसगढ़ में स्वास्थ्य के क्षेत्र में हुए इन बदनाम कांडों का एक और पहलू सरकारी नीतियों से जुड़ता है-- और वह है उद्योग व श्रम विभाग की भूमिका। सिप्रोसीन बनाने वाली करोड़ों रुपयों के टर्न ओवर वाली महावर फार्मा केवल एक फार्मासिस्ट व 3-4 मजदूरों के भरोसे ही चल रही है-- अब इसे ‘कुटीर उद्योग’ ही कहा जा सकता है! उद्योग विभाग और श्रम विभाग के इंस्पेक्टरों को हर महीने फैक्टरियों की जांच करनी होती है, ड्रग इंस्पेक्टरों को दुकानों व अस्पतालों की दवाईयों की गुणवत्ता की जांच करनी होती है, लेकिन किसी ने भी अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं की। केन्द्र की मोदी सरकार बड़े पैमाने पर श्रम कानूनों में जो परिवर्तन कर रही है, उसमें कथित इंस्पेक्टर राज का खात्मा भी शामिल है। इन श्रम कानूनों का सम्बन्ध केवल कारखानों में काम करने वाले मजदूरों के वेतन-भत्तों और उनकी समस्याओं से ही नहीं है, बल्कि जनता के जीवन से भी किस प्रकार जुड़ा है, नसबंदी कांड इसका उदाहरण है। जब निरीक्षण का कोई डर ही नहीं रहेगा, तो जीवन रक्षक दवाईयों के नाम पर चूहामार पाउडर बेचने वाली कंपनियों व कारखानों की तो बन ही आएगी। आम जनता का जीवन भले ही खतरे में पड़ जाये।
स्वास्थ्य के मामले में हो रही सरकारी हत्याओं की ‘नैतिक जिम्मेदारी’ यदि मंत्री की बनती है, तो इस नैतिकता का निर्वाह बिना इस्तीफा कैसे हो सकता है? क्या लोकतंत्र में ‘पिशाच-नृत्य’ की इजाजत है, जो रमन सरकार इस प्रदेश में दिखा रही है? शायद मोहन भागवत का हिन्दुत्व और मोदी का मोदीत्व छत्तीसगढ़ सरकार को यही रास्ता दिखा रहा है!!!

नारी समाज के अंतर्मन की कथा -- ‘स्त्री पत्र’




पूनम तिवारी की उपस्थिति समारोह को गरिमा प्रदान कर रही थी, तो सीमा
विश्वास का अभिनय मंच को रंगारंग बना रहा था। यहां राजनेताओं सहित सभी
प्रकार के नेताओं की उपस्थिति केवल दर्शक दीर्घा तक सीमित थी उनकी
अल्पसंख्या के साथ, लेकिन कलाप्रेमी दर्शकों और साहित्य-संस्कृति से
जुड़ी हस्तियों से ठसाठस भरी हुई। इस समारोह में एक कलाकार (सीमा
विश्वास) ने दूसरे कलाकार (पूनम तिवारी) को सम्मानित किया, लेकिन इस
अहसास के साथ कि --‘‘पूनम, पूनम है और सीमा, सीमा।’’ आकाश की सीमा अनंत
होती है, लेकिन यह अनंतता भी ‘पूनम’ (के चांद) के बिना अधूरी ही होती है।
जितना आकाश हम जानते हैं, उसकी सीमाओं को ग्रह-तारे-नक्षत्र ही प्रकाशित
कर रहे हैं। तो इस तरह होती है रायपुर इप्टा के 18 वें मुक्तिबोध
राष्ट्रीय नाट्य समारोह की गरिमामय और रंगारंग शुरूआत। रायपुर और आसपास
के दर्शक यदि साल भर इस समारोह की प्रतीक्षा करते हैं, तो यह बहुत
स्वाभाविक ही है।
अभिनय जगत में सीमा विश्वास नया नाम नहीं हैं। ‘बैंडिट क्वीन’ से ही लोग
उन्हें पहचानते हैं उनके उत्कृष्ट अभिनय के लिए, फूलन देवी की उनकी
भूमिका के लिए, एक जीवित स्त्री की व्यथा को अपने अभिनय में सशक्त रुप से
उभारने के लिए। फूलन के स्त्री-मन के अंदर झांके बिना, उसे महसूस किए
बिना ऐसा सशक्त अभिनय संभव नहीं था। लेकिन फूलन की व्यथा जिस जातिवादी
उत्पीड़न से उपजी थी, उसे महसूसना हर किसी के बस की बात नहीं। इसके लिए
एक संवेदनशील मन भी चाहिए। इस ‘संवेदनशील मन’ के बिना अभिनय तो हो सकता
है, लेकिन पात्र के ‘अंतर्मन’ में उतरा नहीं जा सकता।
शायद उसी ‘बैंडिट क्वीन’ वाली सीमा विश्वास को कुछ लोग देखने आये हों,
लेकिन उन्हें निराशा ही हाथ लगी होगी। रायपुर, इप्टा के रंगमंच पर वह
‘बैंडिट क्वीन’ नहीं, बल्कि मृणाल थीं, गुरुवर रविन्द्रनाथ टैगोर की। यह
मृणाल अपने ‘स्त्री पत्र’ के साथ उपस्थित थी, इस सोच को चुनौती देते हुए
कि-‘‘पागल है, तो हो, आखिर है तो पुरुष ही।’’ रविन्द्रनाथ टैगोर की मृणाल
इसी पुरुषवादी-छाया से मुक्त होती है, 15 साल के अपने दांम्पत्य जीवन से
तलाक लेकर। इस मायने में टैगोर की कहानी नारी-अस्मिता को खोज की कहानी
है। यह खोज नारी के सौंदर्य की भी खोज है, और उसकी बुद्धिमता की भी।
सीमा विश्वास, टैगोर की इस कहानी को वर्तमान हालातों से जोड़कर मंचित करने में
सफल रही हैं। मंच पर सीमा विश्वास मृणाल ही नहीं, बिन्दु भी थीं। मृणाल
और बिन्दु मिलकर उस भारतीय यथार्थ और कमोबेश वैश्विक यथार्थ की रचना करते
हैं, जहां एक पुरुष-प्रधान समाज की पुरुषवादी-सामंती मानसिकता में स्त्री
अपने स्वतंत्र अस्तित्व की खोज के लिए संघर्षरत है, लेकिन दिक्कत यही है
कि इस संघर्ष में आज भी उसे संपूर्ण नारी समाज का समर्थन-सहयोग नहीं
मिलता, और ‘‘स्त्री ही स्त्री की दुश्मन बन जाती है।’’ इस मायने में
हमारे समाज की आधी आबादी का संघर्ष पुरुषवादी-सामंती मानसिकता से मुक्त
होने का संघर्ष भी है। यह मानसिकता आज भी लड़कियों के जन्म पर मातम ही
मनाती है, जबकि जरुरत है ढोल-गाजे-बाजे के साथ उसके जन्म का उत्सव मनाने
की। यह मानसिकता बिन्दु को आत्महत्या करने के लिए विवश करती है, जबकि
जरूरत है जीने के लिए, हंसने के लिए इस आत्महंता मानसिकता की नकार की।
मृणाल का जीवन-संघर्ष, बिन्दु के मृत्यु-संघर्ष का नकार है। जहां बिन्दु
पूंजीवादी-सामंती सोच के समक्ष समर्पण है, वही मृणाल इस सोच के प्रति
विद्रोह और संघर्ष की अभिव्यक्ति। इस विद्रोह और संघर्ष में उसकी यह
विवशता आड़े नहीं आती कि आगे क्या होगा? इस तरह मृणाल का संघर्ष अपने
स्वतंत्र अस्तित्व के लिए भविष्य का संघर्ष भी है। यह संघर्ष महिलाओं की
साडि़यों में लगी आग से मुक्ति का और पुरुषों की धोतियों में आग लगाने का
संघर्ष भी है। अपने समय के और भविष्य के इस संघर्ष को टैगोर ने अपनी पैनी
दृष्टि से काफी पहले देख लिया था और इसी दृष्टि को मंच पर जीवित करने में
सीमा विश्वास सफल रही हैं।
यह सोलो प्ले (एकल अभिनय) था, जहां उनका साथ देने के लिए, संवाद अदायगी
के दौरान उठती सांसों को थामने के लिए कोई अन्य पात्र मंच पर नहीं था।
यदि उनके साथ कुछ था, तो वह था नेपथ्य का संगीत और लाईट। लेकिन यह साथ
इतना भरपूर था कि रंगदर्शक उनके चेहरे के आते-जाते भावों, क्षण-प्रतिक्षण
बदलते रंगाभिनय को सहजता से देख रहे थे। दर्शकों के चेहरों का रंग बता
रहा था कि उसने न केवल सीमा के ‘स्त्री पत्र’ को स्वीकार किया, बल्कि
उनके ‘स्त्री पत्र’ ने नाट्य समारोह को भी सार्थक रंग में भर दिया।
(लेखक की टिप्पणी- बतौर एक दर्शक ही)

हिन्दी मंच पर संस्कृत रंग- ‘‘चारूदत्तम्’


संस्कृत रंगों को हिन्दी मंच पर बिखेरने की लंबी परंपरा हमारे यहां रही
है। लेकिन शूद्रक या भास की ‘मृच्छकटिकम’ ही वह नाटक है, जिसे शायद
हिन्दी रंगमंच पर सबसे ज्यादा बार खेला गया है और शायद अलग-अलग नामों से
भी! हबीब तनवीर ने इसे ‘मिट्टी की गाड़ी’ के नाम से खेला, तो इप्टा के
मुक्तिबोध समारोह में निर्देशक रामजीबाली के ‘थियेटरवाला’ ने कल इसे
‘चारूदत्तम’ के नाम से पेश किया। संजय उपाध्याय ने भी इसे अपने तरीके से
खेला है। वसंतसेना और चारुदत्त की मूल कहानी भर जीवित रह गई, लेकिन
‘मृच्छकटिकम’ कितना रह गया, कहा नहीं जा सकता। हर निर्देशक ने उसमें अपना
नया रंग भरा, नया अर्थ दिया, उसे सामयिकता से जोड़ा। वास्तव में संस्कृत
का यह रंग हमारे देश के हर प्रकार के रंगमंच पर बिखरा है।
प्रेम, जीवन का मूल दर्शन है और मृच्छकटिकम’ इसी दर्शन पर विकसित हुआ है-- और प्रेम का कोई रंग नहीं होता, हालांकि वह बदरंग भी नहीं हो सकता।
इस प्रेम को न संस्कृत रंग के रुप में, न पारसी रंग के रुप में और न ही
मैथिल या हिन्दी रंग के रुप में उकेरा जा सकता है। यह मनुष्य की
स्वाभाविक प्रवृत्ति है, चाहे वह राज प्रासाद में रहता हो या झोपड़ी में।
शूद्रक की खासियत यह है कि उसने ‘मृच्छकटिकम’ के रुप में इस रंग को
राजप्रासादों की चारदीवारी से मुक्त किया और उसे जनसाधारण के रंग में रंग
दिया। इसमें शाकार की उपस्थिति राजा के साले के रुप में ‘निरंकुश सत्ता
के एक असंवैधानिक केन्द्र’ (बकौल हृषिकेश सुलभ) के प्रतीक के रुप में ही
है, लेकिन मूल कथा तो एक गरीब ब्राह्मण चारुदत्त और नृत्यांगना वसंतसेना के
बीच के प्रेम-विकास की ही है। भास के इस नाटक में लोच और नाट्य अपने पूरे
शबाब पर है। यहां बहुमत रंगदर्शक अपने आपको चारुदत्त की जगह रख सकते हैं।
शायद इसी उर्वर कल्पनाशीलता ने इस नाटक को सबसे ज्यादा खेला जाने वाला
नाटक भी बना दिया है। शूद्रक ने अपने नाटक में जिस प्रकृति-सौंदर्य का
वर्णन किया है, उसको मंच पर साकार करने के लिए निर्देशक की कल्पनाशीलता
कहीं बाधित नहीं होती।
लेकिन रामजीबाली ने अपनी कल्पनाशीलता का उपयोग करने के बजाए
दिखे-दिखाये को फिर से दिखाने की कोशिश की है। उनकी प्रस्तुति कहीं से भी
नया पाठ नहीं रचती, नाटक का ‘पुनर्सृजन’ नहीं करती।’ ‘मृच्छकटिकम’ का
वैसा ‘पुनर्सृजन’, जैसा हबीब तनवीर व संजय उपाध्याय ने किया है। यही कारण
है कि कलाकारों की मेहनत और अभिनय के बावजूद रंगदर्शक बोरियत महसूस करते
हैं और मोबाइल से खेलते दिखे। रामजी बाली की प्रस्तुति रंग-विमर्श के
क्षेत्र में कोई जमीन नहीं तोड़ पाती। यदि अपनी प्रस्तुति में वे कुछ
आधुनिक संदर्भ जोड़ देते, यदि संगीत प्रकाश में कुछ नया प्रयोग कर सकते,
यदि मंच को कुछ सज्जा दे पाते, तो यह एक बेहतर प्रयोग हो सकता था। लेकिन
फिर भी ..... न से, कुछ होना बेहतर है।
लेकिन रंग दर्शकों की मांग है कि जो है, उससे बेहतर चाहिए। यही बेहतर
प्रयोग योगेन्द्र चौबे ने खैरागढ़ संगीत महाविद्यालय के नाट्य विभाग के
अपने छात्रों के साथ मिलकर किया है-- ‘स्मृति मुक्तिबोध’ के नाम से। कल
13 नवंबर को मुक्तिबोध का जन्मदिन भी था और यह उन्हें सही श्रद्धांजलि भी
थी। यह सही है कि मुक्तिबोध की कवितायें जितनी विचार-सघन हैं, अन्य किसी
की कवितायें नहीं। आम पाठकों का इन कविताओं को समझना ही बहुत दुरुह कार्य
है, उसे बिंम्बों में उतारना तो और भी कठिन है। लेकिन मुक्तिबोध के
जीवन-संदर्भों और उनकी कविताओं के साथ जोड़कर जिस सामूहिक रचनात्मक
रंगाभिव्यक्ति का प्रदर्शन हुआ, वह बहुत बेहतर था। ऐसे प्रदर्शन ही समाज
के कचरे को साफ करने के लिए ‘मेहतर’ का काम कर सकते हैं।
(लेखक की टिप्पणी --बतौर एक दर्शक ही)

तो यह है संघी गिरोह का हिन्दू-राष्ट्र!!

इस देश की आबादी यदि 120 करोड़ की आबादी में यदि 85 करोड़ हिन्दू हैं, तो 35 करोड़ गैर-हिन्दू भी हैं. इस देश का इतिहास विभिन्न धर्मों के अनुयाइयों के बीच हिंसक लड़ाइयों का रहा है, तो एक ही धर्म के मानने वाले भिन्न-भिन्न सम्प्रदायों के बीच हिंसक लड़ाईयों का भी है. लेकिन इन सबके बीच सांप्रदायिक सौहार्द्र और धर्मनिरपेक्षता ही फलती-फूलती रही है. यही कारण है कि इस देश में न बहुसंख्यक कभी अल्पसंख्यक हो पाए और न कभी अल्पसंख्यकों को यहां का बहुसंख्यक कभी निगल पाया, इसके बावजूद कि ऐसा करने-कहने वाले सिरफिरों की कभी कमी नहीं रहीं.
आज भी कमी नहीं है. धर्म जागरण मंच के नाम पर काम करने वाले संघी गिरोह के एक पट्ठे ने तो घोषणा ही कर दी है कि साल 2021 तक इन 35 करोड़ लोगों को हिन्दू ही बना देगा--याने हर साल 5 करोड़, हर रोज़ 1.37 लाख लोगों को धर्मान्तरित किया जायेगा. आज संघी गिरोह अपने इसी काम को आसन बनाने के लिए धर्मांतरण कानून बनाने की बात कह रहा है.
संघी गिरोह की इस मंशा को उनके वैचारिक गुरु गोलवलकर के शब्दों में ही समझा जा सकता है. गोलवलकर के अनुसार-- "विदेशी नस्लों (--यानि गैर-हिन्दुओं) को हिन्दू संस्कृति व भाषा को अपनाना होगा, उन्हें हिन्दू धर्म का सम्मान करना तथा उसके प्रति श्रद्धा रखना सीखना होगा, उन्हें हिन्दू नस्ल व संस्कृति-- अर्थात् हिन्दू राष्ट्र के गौरवान्वयन को छोड़कर और कोई विचार अपने मन में नहीं लाना चाहिए, उन्हें हिन्दू नस्ल में अपने अलग अस्तित्व को समाहित करना होगा, वे कोई दावा नहीं कर सकते, किसी सुविधा की मांग नहीं करेंगे, उन्हें किसी भी प्रकार के विशेषाधिकार प्राप्त नहीं होंगे-- यहां तक कि नागरिक अधिकार भी."
तो यह है संघी गिरोह का हिन्दू-राष्ट्र!! अब आप समझ ही सकते हैं कि इस देश के एक प्रधानमंत्री की हैसियत से फेंकू महाराज देश के सामने धर्मांतरण पर अपने 'पवित्र' विचारों को क्यों नहीं रखना चाहते?

अमेरिकी इतिहास भी उतना ही काला है जितना भारतीय वर्तमान


(15 नवम्बर को मंचित नाटक' द फेयर लेडी' की समीक्षा)
रंगभेद अमेरिकी समाज का वैसा ही यथार्थ है जैसा भारतीय समाज का यथार्थ सांप्रदायिकता है। ये बीमारियां मानव समाज का रोगाणु हैं, क्योंकि एक समुदाय के खिलाफ दूसरे समुदाय उत्पीड़न को ये औचित्य प्रदानकरती हैं। इसीलिए चाहे अमेरिका में रंगभेद हो या भारत में जातिभेद औरसांप्रदायिकता, इनके खिलाफ संघर्ष उदात्त मानवीय भावनाओं की रक्षा करने और एक समानतामूलक समाज की रचना करने का एक व्यापक संघर्ष भी है। सदियों से यह संघर्ष चल रहा है और मानव समाज आगे बढ़ रहा है। इस संघर्ष ने अमेरिका में मार्टिन लूथर किंग और अब्राहम लिंकन को पैदा किया है,तो भारत में अंबेडकर और ज्योतिबा फुले को। भगतसिंह भी इस संघर्ष की उपज थे, जिन्होंने स्पष्ट रुप से मानव द्वारा मानव के और एक राष्ट्र द्वारा दूसरे राष्ट्र के शोषण को खत्म करने का आह्वान किया था। एक राष्ट्र द्वारा दूसरे राष्ट्र के शोषण को खत्म करने के लिए जरूरी है कि नव उप-निवेशवाद और साम्राज्यवाद को खत्म किया जाए, तो मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण को खत्म करने के लिए जरूरी है कि सामाजिक न्याय की स्थापना किया जाए। नस्ल, धर्म, जाति, भाषा, प्रांत के आधार पर बांटने वाली ताकतों और उनकी विचारधारा के खिलाफ संघर्ष करने की. तभी इस दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है। एक शोषणमुक्त समाज के लिए यह एक वैश्विक संघर्ष है और यह संघर्ष चाहे जहां भी चल रहा हो, एक सच्चे इंसान को इसके पक्ष में खड़ा होना चाहिए।
यही पक्षधरता 'द फेयर लेडी' के मंचन में रंगदर्शकों ने दिखाई। 18वें मुक्तिबोध नाट्य समारोह के चौथे दिन भोपाल इप्टा की इस प्रस्तुति ने रंगदर्शकों को बांधे रखा। रुचिर शुक्ला ने अपनी निर्देशकीय क्षमता का पूरा प्रदर्शन किया।
मूल नाटक ज्यां पाल सार्त्र का है, जो 20 वीं सदी के ऐसे फ्रांसीसी दार्शनिक थे, जिनके मार्क्सवादी विचारों और विश्लेषण का पूरी दुनिया पर प्रभाव पड़ा। लेकिन उनका दर्शन विश्लेषण साहित्य.संस्कृति से अलग नहीं, बल्कि उसका अभिन्न हिस्सा ही था। 1964 में उनके लिए नोबेल पुरस्कार की भी घोषणा की गई थी, लेकिन इस पुरस्कार के वर्ग.चरित्र से वे अच्छी तरह वाकिफ थे और उन्होंने इसे लेने से इंकार कर दिया था। तब उनकी काफी आलोचना भी हुई थी और उन्हें 'घमंडी' भी कहा गया था। लेकिन नोबेल पुरस्कारों में छिपी राजनीति भी पूरी तरह स्पष्ट हो गई और इसका अवमूल्यन तब पूरी तरह से सामने आ गया, जब ओबामा को विश्व शांति के लिए नोबेल से पुरस्कृत किया गया, जबकि उनकी नीतियां पूरी दुनिया में युद्ध का विध्वंस रच रही थी। ज्यां पाल सार्त्र ने अपनी लेखनी से अमेरिका के 'कालेपन' और 'अनैतिकता' को पूरी शक्ति से उजागर किया। 'द फेयर लेडी' में भी उन्होंने अमेरिकी श्वेत समाज के रंगभेदी पूर्वाग्रहों और अमेरिकी प्रशासन और न्याय व्यवस्था की रंगभेदी पक्षधरता को निर्ममता से उजागर किया है। यह वह वर्ग विभाजित समाज है, जो सामाजिक रुप से गोरे और कालों के बीच बंटा है, जहां श्वेत समाज का अर्थव्यवस्था, न्याय और राजनीति पर पूरा नियंत्रण है, और वह इसका उपयोग कालों के दमन.उत्पीड़न, उनके शोषण और उन पर अपना अमानवीय प्रभुत्व बनाये रखने के लिए करता है। लेकिन यह भी सही है कि गरीब गोरे (यहां वेश्या लिजी) की संवेदना गरीब काले की संवेदना से अलग नहीं है। उसे यह अहसास है कि किस प्रकार निर्दोष कालोें को 'शिकार' बनाया जाता है।
ज्यां पाल सार्त्र ने यह नाटक 1946 में लिखा था। 68 साल बाद भी 'अमेरिकी प्रजातंत्र' की हकीकत बहुत ज्यादा नहीं बदली है। ओबामा के शीर्षस्थ होने के बावजूद नस्लीय घृणा का दौर-.दौरा जारी है और अमेरिकी जेलें कालों से ठसाठस भरी हुई हैं।
चाहते तो दिनेश नायर इस नाटक का भारतीयकरण कर सकते थे और वह ज्यादा प्रभावी, प्रासंगिक और सामयिक होता। भारत में आज जिस रुप में दलित उत्पीड़न है, क्या वह अमेरिकी नस्लीय भेद से कम भयावह है? जिस प्रकार विध्वंसक दंगों के माध्यम से बहुमत समुदाय को अल्पमत समुदाय के खिलाफ खड़ा किया जाता है, वह रंगभेदी मारकाट से कम भयावह है? वास्तविकता तो यही है कि जिस प्रकार रंगभेद अमेरिकी प्रजातंत्र को खोखला कर रहा है, उसी प्रकार जातिभेद और सांप्रदायिकता विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र को ध्वस्त कर रही है। भारतीय समाज के यह रोगाणु भारतीय संविधान के आदर्शों और स्वाधीनता संग्राम के मूल्यों को ही चोट पहुंचा रहे हैं और सामाजिक न्याय को बाधित कर रहे हैं।
पात्रों का अभिनय शानदार रहा है। खासकर लिजी की भूमिका में प्रिया उदेनिया, ट्रेवोन ;(नीग्रो) की भूमिका में स्कंद मिश्रा तथा सीनेटर की भूमिका में सुरेश जरगर ने सराहनीय अभिनय किया है। संगीत और प्रकाश ने पात्रों के अभिनय को जीवंत बनाने में अपना योगदान तो किया ही है।
(;लेखक की टिप्पणी.. बतौर एक दर्शक ही)

जब व्यापारी भये मंत्री, तो लूट काहे की ?


छत्तीसगढ़ में भले ही तम्बाकू उत्पादों पर रोक है, लेकिन यह तम्बाकू नहीं, ' गुडाखू ' है. जैसे लोहा, लोहे को काटता है और जहर, जहर को मारता है, वैसे ही सडा गुड़, सड़े तम्बाकू के दुर्गुणों को दूर कर उसे ' संजीवनी ' बनाता है. छत्तीसगढ़ के किसी भी गांव में चले जाइए, मंजन के रूप में गुडाखू के प्रयोग का गुणगान करने वाले मिल जायेंगे. ये लोग बताएँगे कि किस तरह गुड़ाखू दांत में लगे कीड़ों को मारता है या दांत-दर्द निवारण के लिए ' रामबाण औषधि ' है. अब भले ही आपका विज्ञान, वैज्ञानिक शोध और वैज्ञानिक अध्ययन यह कहता रहें कि अन्य राज्यों में मुख-कैंसर के 30% मामलों के मुकाबले छत्तीसगढ़ में 50% मामले सामने आ रहे हैं, भले ही आप कहें कि प्रदेश की जनसंख्या का 53% और 15 साल से कम उम्र के बच्चों का 28% से अधिक गुड़ाखू की लत का शिकार है, उससे क्या ?
भई हम तो वैज्ञानिक चिंतन पर नहीं, आस्था-चिंतन पर विश्वास रखने वाले लोग हैं. हमारी आस्था तो गुड़ाखू में है. हमारा आस्था-शोध तो यह बताता है कि भगवान राम जब छत्तीसगढ़ में वन-गमन कर रहे थे, तो उन्होंने भी गुड़ाखू का ही उपयोग किया था -- सीता के अपहरण से उपजे अपने दर्द को दबाने के लिए. तो भाईयों, हमारी सरकार की आस्था है कि गुड़ाखू से मुख-कैंसर नहीं फैलता, बल्कि यह तो ' दर्द निवारक संजीवनी ' है. इस प्रदेश के लोगों का दर्द हरने के लिए ही इस प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री ' गुड़ाखू उद्योग ' चला रहे हैं. यदि आप में हिम्मत हैं, तो इस ' गुड़ाखू-आस्था ' को चुनौती देकर थोड़ा दिखाएं !!
इसीलिए भाईयों, जब ' रामराज ' में इस पर कोई प्रतिबन्ध नहीं था, तो ' भाजपाई सुराज ' में कैसा प्रतिबंध ? बल्कि हम तो इस ' सुराज ' को ' रामराज ' में बदलने के लिए इसका व्यापक प्रचार करेंगे, इस रामबाण औषधि को घर-घर पहुंचाएंगे. सरकार इसके लिए कृत-संकल्पित है. हमारी सरकार ने इसीलिए गुड़ाखू के कच्चे माल पर केवल 1% टैक्स लगाया है और गुड़ाखू विक्रय पर केवल 14% , जबकि तम्बाकू उत्पादों और पान-मसालों पर 40% तक टैक्स है.
छत्तीसगढ़ में गुड़ाखू का सालाना कारोबार लगभग 4000 करोड़ रुपयों का है. सरकारी खजाने में 40% टैक्स के हिसाब से आता 1600 करोड़ रूपये, लेकिन आ रहा है केवल 560 करोड़ रूपये. 1000 करोड़ रुपयों से ज्यादा कर-छूट इसीलिए दी जा रही है कि स्वास्थ्य मंत्री को प्रोत्साहन मिले कि इस रामबाण दवा को घर-घर पहुँचाने में अपना भरपूर योगदान दें, जिनके परिवार का इस धंधे पर 70% कब्ज़ा है.
एक बात और ध्यान रखें. छत्तीसगढ़ में दवाईयों का कारोबार 3600 करोड़ रुपयों का है, जबकि 5 रूपये वाली गुड़ाखू की डिबिया का कारोबार 4000 करोड़ रुपयों का है. अब आप ही बताइये, दवाई जरूरी कि गुड़ाखू ??!!

जाति क्यों नहीं जाती ?


जातिवाद भारतीय समाज की ज्वलंत सच्चाई है और इससे उपजी अस्पृश्यता (छुआछूत) भी. जो लोग छुआछूत नहीं मानते, उनमें से भी कई लोग दलित-आदिवासियों को अपने रसोईघर में प्रवेश देने के लिए तैयार नहीं हैं.
नेशनल कौंसिल ऑफ़ एप्लाइड इकोनोमिक रिसर्च का सर्वे यह बताता है कि हमारे देश में 27% लोग आज भी किसी-न-किसी प्रकार का छुआछूत मानते है. हालांकि जातिवाद हिन्दू धर्म की बुराई है, लेकिन इस ' हिन्दुवाद ' के प्रभाव से कोई धर्म अछूता नहीं है. छुआछूत को मानने वालों में जितने हिन्दू हैं, उतने ही मुस्लिम, सिख और बौद्ध आदि भी है. वे दलित और आदिवासी भी छुआछूत को मानते हैं, जो इसके सबसे ज्यादा शिकार होते है. उनमें भी जातियों का पदानुक्रम सवर्ण हिन्दुओं के समान ही मौजूद हैं.
सर्वे इस तथ्य को इंगित करता है कि छुआछूत को मानने वालों में 52% लोग ब्राह्मण समाज से है, जो बहुत स्वाभाविक भी है. हिन्दीभाषी पट्टी इसका सबसे ज्यादा शिकार है. मध्य प्रदेश में 53% लोग छुआछूत को मानते हैं, तो हिमाचल में 50%, छत्तीसगढ़ में 48%, राजस्थान व बिहार में 47%, उत्तर प्रदेश में 43% तथा उत्तराखण्ड में 40% लोग छुआछूत को मानते है. हिन्दीभाषी पट्टी के विपरीत पश्चिम बंगाल में केवल 1% व केरल में केवल 2% तथा महाराष्ट्र में केवल 4% लोग ही छुआछूत में विश्वास करते हैं. ऐसा क्यों?
हिंदी पट्टी के ये राज्य आज भी बदतरीन सामंती विचारधारा से ग्रस्त हैं. किसी मूलगामी सामाजिक सुधार आन्दोलन का यहां कोई प्रत्यक्ष प्रभाव नहीं दिखता. कांग्रेस-भाजपा के 'राजनैतिक संरक्षण' में आबाओं और बाबाओं का साम्राज्य फैला दिखता है, जो केवल इन पार्टियों के लिए वोट बटोरने का ही काम करते हैं. उत्तरप्रदेश में मायावती भी छुआछूत की इस दीवार को नहीं तोड़ पाई, इसलिए कि मायावती के 'अम्बेडकरवाद' को 'सवर्ण हिन्दूवाद' ने आसानी से ग्रस लिया. मायावती की 'सोशल इंजीनियरिंग' भी सत्ता हथियाने का एक फार्मूला-भर बनकर रह गई और जातिवाद व छुआछूत पर वह कोई निर्णायक चोट नहीं कर पाई. हां, कुछ ब्राह्मण पर्सनालिटी मायावती के चरणों को स्पर्श करते जरूर दिखी. लेकिन स्पष्ट है कि सवर्णवाद अछूतों के आगे नत-मस्तक नहीं था. मायावती भी जातिवाद के सामाजिक-आर्थिक आधारों पर कोई चोट नहीं कर पाई.
इसके विपरीत बंगाल और केरल में यह काम हुआ. वहां स्वाधीनता-प्राप्ति से पहले से ही सामाजिक सुधार आंदोलनों की लंबी परंपरा रही है. इन आन्दोलनों ने हिंदूवादी-सामंती सोच पर ही करारी चोट की तथा समाज पर हिंदूवादी जीवन पद्धति के प्रभुत्व को कमज़ोर करने का ही काम किया. महाराष्ट्र में यह चोट ज्योतिबा फुले ने की. इन सामाजिक सुधार आंदोलनों के साथ ही स्वाधीनता के राजनैतिक आंदोलन में यहां वामपंथ ने स्थान ग्रहण किया. कालांतर में यहां काफी भूमि-संघर्ष हुए और भूमि-सुधार में ये राज्य पूरे देश में अव्वल रहे. इन भूमि-सुधारों ने इन राज्यों के कमजोर और पिछड़े तबकों, विशेषकर दलित-आदिवासियों को आर्थिक हैसियत प्रदान की और राजनीति में भी सवर्णों के आर्थिक प्रभुत्व को तोड़ने में वे कामयाब रहे.
मनु की वर्ण-व्यवस्था ने अवर्णों को संपत्ति के अधिकार से वंचित ही इसीलिए किया था कि संपत्ति-संबंध किसी समुदाय की आर्थिक-सामाजिक-राजनैतिक हैसियत को निर्धारित करते हैं. यह व्यक्ति-विशेष की हैसियत को भी निर्धारित करता है. मायावती की व्यक्तिगत हैसियत का राज उनकी निजी संपत्ति में ही छुपा है. वे भी इसे जानती हैं और इसीलिए उनकी पूरी कोशिश अपनी संपत्ति-विस्तार में होती है. यह संपत्ति ही राजनीति में उन्हें प्रतिष्ठित करती है. एक अमीर के साथ जातिभेद-व्यवहार उसी तरह का नहीं होता, जिस निर्ममता के साथ किसी गरीब अवर्ण के साथ होता है. जातिभेद से उत्पन्न प्रताड़ना का दुःख दोनों के लिए अलग-अलग ही होता है.
इस सर्वे ने एक बार फिर जातिवादी रोग की गंभीरता को सामने ला दिया है. कांग्रेस-भाजपा से तो यह आशा नहीं की जा सकती कि वह इससे लड़ेगी, बल्कि ये दोनों पार्टियां के लिए तो जातिवाद 'संजीवनी बूटी' है. लेकिन सामंतवाद के खिलाफ जो ताकतें लड़ना चाहती हैं. जो ताकतें दलित-आदिवासियों की वर्त्तमान स्थिति से दुखी हैं, जो चाहते हैं कि जातिवाद-जैसी बुराई को जड़-मूल से किया जाएं, सामाजिक-न्याय को प्रतिष्ठित करने की दिशा में समानतामूलक समाज की स्थापना की जाये, उन सभी लोगों को सोचना होगा कि आखिर जाति क्यों नहीं जाती? मित्रों, आप क्या सोचते हैं??