Saturday, 27 August 2016

'विश्व-गुरू' बनने का जुमला !!

वर्ष 2016 के लिए सेंटर फॉर वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग की रिपोर्ट आ चुकी है. यह सेंटर पूरी दुनिया के शिक्षा संस्थानों को आठ मानदंडों पर कसता है -- शैक्षणिक गुणवत्ता, रोजगार, शिक्षकों की योग्यता, प्रकाशन. प्रभाव, प्रतिष्ठा, शैक्षणिक बोर्ड की भूमिका तथा पेटेंट के मामलों में. इन आठ मानकों पर कसने के बाद यह सेंटर किसी संस्थान-विशेष की रैंकिंग तय करता है.

विश्व में हजारों शैक्षणिक संस्थाएं हैं और भारत में सैकड़ों. विश्व के पहले दस शैक्षणिक संस्थानों में हमारा स्थान पहले भी नहीं था. प्रथम सौ सर्वश्रेष्ठ शैक्षणिक संस्थानों में भी हमारी कोई जगह नहीं है. लेकिन हम खुश हो सकते हैं कि विश्व के प्रथम 1000 बेहतरीन शिक्षा संस्थाओं में से 16 हमारे देश के हैं. भले ही, आईआईटी-दिल्ली की रैंकिंग पिछले वर्ष के 341 से गिरकर 354 पर आ गई है, लेकिन यह आज भी देश की शिक्षा संस्थाओं में अव्वल है. इसका अर्थ है कि विश्व रैंकिंग में देश की अन्य श्रेष्ठ शिक्षा संस्थानों की रैंकिंग में भी गिरावट आई ही होगी ! हुआ भी ऐसा ही है -- देश के दूसरे स्थान पर प्रतिष्ठित दिल्ली विश्वविद्यालय की रैंकिंग पिछले वर्ष के 379 से गिरकर 419 हुई है, तो तीसरे स्थान पर खड़ी भारतीय विज्ञान संस्थान की रैंकिंग भी 448 से गिरकर 471 तथा चौथे पायदान पर खड़ी पंजाब विश्वविद्यालय की रैंकिंग 491 से गिरकर 511 पर पहुंच गई है. इससे स्पष्ट है कि देश में श्रेष्ठ शिक्षा संस्थानों के शैक्षणिक-स्तर में गिरावट आई है.

सेंटर फॉर वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग की यह रिपोर्ट हमारे देश में शिक्षा के गिरते स्तर पर तीखी टिप्पणी है. जिन मानकों पर शिक्षा संस्थानों को कसा गया है, प्रायः उन सभी में देश में अव्वल मने जाने वाले शैक्षणिक संस्थानों में गिरावट दर्ज की गई है. शैक्षणिक गुणवत्ता की कसौटी पर आज भी कलकत्ता विश्वविद्यालय देश में अव्वल है, लेकिन विश्व रैंकिंग में इसका स्थान 140 से गिरकर 150 हो गया है. इसी तरह, सर्वाधिक जर्नल व अन्य प्रकाशनों के साथ भारतीय विज्ञान संस्थान ने देश में अपना अव्वल स्थान तो बनाए रखा है, लेकिन विश्व रैंकिंग में अपनी गिरावट को नहीं रोक पाया. पिछले साल इसे 315वां स्थान मिला था, तो इस बार इसे 327वां स्थान मिला है. इस संस्थान के बोर्ड की भूमिका देश में बेहतरीन है और इसने विश्व रैंकिंग में 470वां स्तान पाया है, लेकिन वह पिछले साल 447वें स्थान पर था. इसी तरह यह संस्थान पेतेंटके पैमाने पर विश्व रैंकिंग में 303वें स्थान पर और देश में अव्वल है, लेकिन पिछले साल 176वीं रैंकिंग के साथ आईआईटी-बॉम्बे देश में अव्वल था. इसका अर्थ है कि हमारे देश के बौद्धिक संस्थान पेटेंट की लड़ाई में विश्व-स्तर पर तेजी से पिछड़े हैं.

यदि विश्व रैंकिंग में गिरावट के साथ कुछ शिक्षा संस्थान देश में अव्वल बने हुए हैं, तो इसका अर्थ यह भी है किइन शिक्षा संस्थाओं के शैक्षणिक स्तर में भी गिरावट जारी है. लेकिन यदि वे फिर भी अव्वल बने हुए हैं, तो इसका यह भी अर्थ है कि अन्य शिक्षा संस्थानों के स्तर में और तेज़ी के साथ गिरावट जारी है. इसलिए यह अव्वलता 'शैक्षणिक अभ्युदय' नहीं, भारतीय शिक्षा संस्थाओं के पतन की ही कहानी कहती है.

क्या इसी गिरावट के साथ भारत 'विश्व-गुरू' बनने का दावा करेगा? यदि इस दावे को शिक्षा के क्षेत्र में जारी निजीकरण से जोड़कर देखें, तो यह स्पष्ट है कि अन्य बातों की तरह यह दावा भी एक 'जुमला' ही बनने जा रहा है.  
                                                                                                        sanjay.parate66@gmail.com  


Friday, 26 August 2016

जरूरत है मनरेगा को जिन्दा रखने की


2 सितम्बर को आहूत मजदूरों की हड़ताल की एक प्रमुख मांग यह भी है कि रोजगार गारंटी का विस्तार शहरी क्षेत्रों  में भी किया जायें और काम के न्यूनतम दिनों की संख्या बढ़ाकर 200 की जाएं. इसके लिए वे बजट में वृद्धि की भी मांग कर रहे हैं. यह मांग मनरेगा की सार्थकता को भी दिखाती है, बावजूद इसके कि यह योजना तमाम बुराईयों से ग्रस्त है.

देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में मनरेगा का महत्त्वपूर्ण स्थान है. इसके बावजूद सत्ताधारी पार्टियों ने इसका क्रियान्वयन कभी भी ईमानदारी से नहीं किया और इसको 'निर्जीव' बनाने की कोशिशें जारी है. मनरेगा में काम मांगने वाले सभी परिवारों को 100 दिन का काम देने के लिए ही आज 90000 करोड़ रुपयों की जरूरत है, जबकि बजट आबंटन है केवल 30-32 हजार करोड़ रूपये ही. मजदूरों को 100 दिन काम की जगह औसतन 47-49 दिन काम ही मिल रहा है, लेकिन सही समय पर भुगतान की कोई गारंटी नहीं है. राष्ट्रीय स्तर पर 42% मजदूरों को, तो छग प्रदेश स्तर पर 81% लोगों को देरी से भुगतान हो रहा है और इससे इस योजना के प्रति मजदूरों की अरुचि बढ़ना स्वाभाविक है. छत्तीसगढ़ में इस वर्ष जून अंत तक मजदूरी का 300 करोड़ रुपयों से अधिक बकाया था और देरी से भुगतान के मामले में देश में दूसरे स्थान पर खड़ा है. मजदूरी दर भी असमान है, केरल में 232 रूपये, तो राजस्थान में 116 रूपये प्रतिदिन ही -- याने न्यूनतम मजदूरी से भी ग्रामीण मजदूर वंचित हैं. केन्द्र की भाजपा सरकार ने मजदूरी और सामग्री का अनुपात 60:40 से बदलकर 51:49 कर दिया है. इससे रोजगार उपलब्धता में गिरावट के साथ ही भ्रष्टाचार की आशंका भी बढ़ी है.

लेकिन जिस तरह देश में खेती-किसानी का संकट बढ़ रहा haiहै और संकर से जुड़े दुष्परिणाम -- भूमिहीनता, ऋणग्रस्तता, पलायन, किसान आत्महत्या आदि -- सामने आ रहे हैं, मनरेगा की प्रासंगिकता बढती जा रही है.  तमाम अध्ययन भी यही दिखाते हैं कि मनरेगा ने किस तरह ग्रामीण जीवन को सबल बनाया है. रिज़र्व बैंक के अनुसार, इससे ग्रामीण क्षेत्रों में मनरेगा-इतर कार्यों में मजदूरी दरों में 10% की वृद्धि हुई है. नेशनल कौंसिल ऑफ़ एप्लाइड इकॉनोमिक रिसर्च के अनुसार, इसके कारण देश के ग्रामीण क्षेत्रों में 25% परिवारों की गरीबी कम हुई है. मनरेगा में लगभग आधी महिला मजदूर हैं और इसने महिला-पुरूष मजदूरी में समानता का सबक भी सिखाया है, जो कि निजी क्षेत्रों में श्रम कानूनों के जरिये आज भी हासिल नहीं किया जा सका है. जिस हद तक मनरेगा ने ग्रामीणों को सही अर्थों में रोजगार दिया है, उस हद तक उनका पलायन भी रूका है. इस क़ानून से सबसे ज्यादा लाभान्वित हुए हैं आदिवासी-दलित-महिला व कृषि मजदूर जैसे वंचित सामाजिक-वर्गीय समूह, जिन्होंने आर्थिक सशक्तिकरण के कारण ग्रामीण सामंती प्रभुओं की दादागिरी को चुनौती दी है. इसलिए निहित स्वार्थों के लिए मनरेगा हमेशा आंखों का कांटा बना रहा है.

हमारे देश का कृषि संकट यह है कि देश में आज भी आधे से ज्यादा परिवार खेती-किसानी से जुड़े हैं, जो कि घाटे का सौदा हो गया है. वे खेती केवल इसलिए नहीं छोड़ रहे हैं कि उनके पास आजीएविका का कोई दूसरा साधन नहीं है. जिन्होंने हिम्मत दिखाई है, वे दिहाड़ी मजदूर बनकर रह गए हैं -- उनके लिए शहरों में काम नहीं और गांव वे छोड़ नहीं पाए. ऐसी हालत में मनरेगा ने उन्हें 'राहत' जरूर ही दी है. इसीलिए देश के गरीबों को जिन्दा रखने के लिए आज मनरेगा को जिन्दा रखने की जरूरत है.

वामपंथ के दबाव में संप्रग सरकार को मनरेगा लागू करना पड़ा था. भाजपा-नीत सरकार वामपंथ के किसी भी निशानी के जिन्दा रहने के खिलाफ है. सो, मनरेगा उसके खुले-दबे निशाने पर है. इसीलिए आम जनता के हितों के लिए चिंतित तमाम संगठनों को इसे अपने एजेंडे में लेना चाहिए.
                                                          

Saturday, 13 August 2016

आंकड़े गवाह है कि अल्पसंख्यक समुदाय भेदभाव का शिकार है....


भारत में शिक्षा और रोजगार के संबंध में हाल ही में राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन (एनएसएसओ) ने जो आंकड़े जारी किये हैं, उससे एक बार फिर साफ़ हो गया है कि देश में अल्पसंख्यक समुदाय भयंकर भेदभाव का शिकार है.
इन आंकड़ों के अनुसार देश में मुस्लिम अल्पसंख्यक आज भी भयंकर अशिक्षा का शिकार है और ग्रामीण मुस्लिमों में उनकी निरक्षरता का प्रतिशत 30% और महिलाओं में 49% है, तो शहरी मुस्लिमों में भी यह क्रमशः 19% और 35% है. यह स्थिति उस समय है, जब देश एक दिन बाद ही स्वतंत्रता की 69वीं वर्षगांठ मनाने जा रहा है. यदि अशिक्षा का सीधा संबंध उनकी आर्थिक स्थिति से है, तो इसका सीधा अर्थ यह भी है कि यह समुदाय देश के सबसे गरीब, वंचित व पिछड़े तबकों में से एक है और उनकी इस स्थिति के लिए इस देश का शासक वर्ग और उनकी नीतियां ही सीधे-सीधे जिम्मेदार है.
गरीबी और अशिक्षा का सीधा असर रोजगार पर पड़ता है और सरकारी नौकरियों में उनका बहुत कम प्रतिनिधित्व है. इस समुदाय के अधिकांश लोग स्व-रोजगार से जुड़े हैं और यह स्व-रोजगार भी उनके लिए "जैसे-तैसे पेट भरने" का माध्यम भर होते हैं, उनकी आर्थिक उन्नयन का माध्यम नहीं. यही कारण हैं कि मुस्लिमों में बेरोजगारी दर ग्रामीण क्षेत्रों में 3.9% तथा शहरी क्षेत्रों में 2.6% है.
लेकिन शिक्षा भी अल्पसंख्यक तबकों के लिए रोजगार की गारंटी नहीं है. यदि ऐसा होता, तो इस देश का ईसाई समुदाय बेरोजगारी की बीमारी से जूझ नहीं रहा होता. एनएसएसओ के ही आंकड़े बता रहे हैं कि ईसाईयों में निरक्षरता दर सबसे कम है और स्नातकों का प्रतिशत सबसे अधिक. लेकिन इसके बावजूद उनमें बेरोजगारी दर ग्रामीण क्षेत्रों में 4.5% तथा शहरी क्षेत्रों में 5.9% है.
इसके साथ ही यह भी जोड़ लें कि इन दोनों अल्पसंख्यक समुदायों से बाहर बहुसंख्यक हिन्दू समुदाय में आदिवासी-दलित तबकों (जो इस देश की आधी आबादी है) की स्थिति भी शिक्षा और रोजगार के मामले में बहुत ही दयनीय है. इनके बीच भी बेरोजगारी की दर देश में बेरोजगारी की औसत दर से बहुत ऊंची है. समग्र रूप से देश में बेरोजगारी की औसत दर 3.8% है, (ग्रामीण क्षेत्र में 1.7% और शहरों में 3.4%).
फिर इस देश में शिक्षा और रोजगार के अवसर किसके लिए सुरक्षित हैं? जो लोग "योग्यता" का शोर मचाते हैं, उन्हें जवाब देना होगा कि फिर ईसाई समुदाय रोजगार में उचित प्रतिनिधित्व से वंचित क्यों हैं? जो लोग "मुस्लिम तुष्टिकरण" का शोर मचाते हैं, उन्हें जवाब देना चाहिए कि फिर मुस्लिम समुदाय में इतनी गरीबी और निरक्षरता क्यों? जो लोग जीडीपी वृद्धि से रोजगार वृद्धि के दावे कर रहे हैं, उन्हें भी यह जवाब देना होगा कि यह पूरी वृद्धि "अल्पसंख्यक सवर्णों" की तिजोरियों में ही क्यों कैद हो रही है?
साफ़ है कि हमारे देश के विकास की कहानी दरअसल धर्म, जाति और वर्ग के आधार पर शोषण के जरिये चंद लोगों के विकास की ही कहानी है, जिसका गुणगान परसों परिधान मंत्रीजी लाल किले से करने जा रहे हैं.

Monday, 25 July 2016

जाति और वर्ग : कांचा इलैया की पुस्तक "मैं हिन्दू क्यों नहीं हूं" के संदर्भ में

                   जाति और वर्ग
       (कांचा इलैया की पुस्तक "मैं हिन्दू क्यों नहीं हूं" के संदर्भ में)
                                                                 

ठीक उसी प्रकार, जिस प्रकार कि वर्ग एक ठोस वैश्विक यथार्थ है, जाति एक ठोस भारतीय-एशियाई सच्चाई है, जो मनु आधारित वर्ण-व्यवस्था की उपज है. यह वर्ण-व्यवस्था बहुसंख्यक मेहनतकशों के श्रम को हड़पने की और इससे पैदा अतिरिक्त मूल्य और मुनाफे को उच्चवर्णीय अल्पसंख्यक समुदाय की सेवा और ऐशो-आराम के लिए लगाती है. इस प्रकार यह शोषण की संस्कृति पर आधारित व्यवस्था है.

जातिवाद के गहरे निहितार्थ हैं और सामाजिक-सांस्कृतिक-आर्थिक-राजनैतिक आयाम. यदि सामाजिक-सांस्कृतिक पहलू को छोड़ दिया जायें, तो आज जातिवाद का स्वरुप शुद्ध ब्राह्मणवाद तक सीमित नहीं रह गया है, जैसा कि इलैया मानते हैं.

वर्ग भेद के भी गहरे सामाजिक-सांस्कृतिक-आर्थिक-राजनैतिक आयाम हैं. आदिम साम्यवाद की व्यवस्था से गुजरने के बाद से ही मानव सभ्यता का चरित्र वर्गीय हो जाता है, लेकिन पूंजीवाद में इसका स्वरुप व शोषण खुलकर सामने आ जाता है.

हम एक शोषणमुक्त समाज की स्थापना करना चाहते हैं, तो यह वर्गहीन समाज में ही संभव है. वर्गहीन समाज के लिए यह जरूरी है कि जाति-आधारित शोषण का भी वह खात्मा करें. इस मायने में वर्गहीन समाज का सामाजिक स्वरुप जातिहीन समाज की ओर बढ़ना ही है. लेकिन इसके उलट, एक जातिहीन समाज क्या वास्तव में एक वर्गहीन समाज होता है? या एक जातिहीन समाज क्या वास्तव में वर्गीय शोषण का खात्मा कर देता है? यूरोप का इतिहास देखे या समकालीन यूरोपीय पूंजीवाद पर नजर डालें, जहां 'वर्ण व्यवस्था और जातिवाद' की ठोस भारतीय-एशियाई संरचना लागू नहीं की जा सकती, वहां भी शोषण पर आधारित दूसरे सामाजिक-सांस्कृतिक कारक काम करते हैं. स्पष्ट है कि जातिहीन समाज वर्गहीन समाज नहीं हैं. इसलिए यह कहना कि भारतीय संदर्भ में जाति ने वर्ग का स्थान ले लिया है, पूरी तरह से सही नहीं है. वास्तव में जातिवाद, भारतीय संदर्भ में शोषण पर आधारित व्यवस्था को बनाये रखने की एक ठोस वर्गीय सच्चाई है. इसीलिए जातिवाद के खिलाफ संघर्ष को शोषणमुक्त समाज की स्थापना के लिए वर्गीय संघर्षों से जुड़ना चाहिए.

भारतीय संविधान 'अनुसूचित जातियों' की बात करता है. राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान गांधीजी ने इस समुदाय को 'हरिजन' के रूप में चिन्हित किया था. वर्तमान राजनैतिक आंदोलनों में यह समुदाय 'दलित' के रूप में अभिव्यक्त हो रहा है. कांचा इलैया इन अनुसूचित जातियों को पिछड़ी जातियों के साथ मिलाकर निर्मित इस विशाल समुदाय को 'दलित बहुजन' कहकर संबोधित करते हैं. ऐसी ही सोशल इंजीनियरिंग कांशीराम ने 'बहुजन' के नाम पर की. नाम आप कुछ भी दे दें, वास्तव में लक्षित समुदाय स्पष्ट है, जिसे वर्तमान प्रचलित अर्थों में 'दलित' माना जाता है. इस 'दलित' समुदाय का अस्तित्व 'अनुसूचित जातियों' के बाहर भी है और सामाजिक रूप से कथित पिछड़ों के साथ उनका कोई साम्य भी नहीं है. ये वे दलित हैं, जो आरक्षण की व्यवस्था के बावजूद राजनैतिक-सांस्कृतिक स्तर पर बहुत पिछड़े हुए तो हैं ही, सामाजिक और आर्थिक शोषण के भी शिकार हैं और समाज श्रेणी में उनका स्थान पिछड़े वर्गों से भी नीचे हैं.

कांचा इलैया ने दलितों के सामाजिक-सांस्कृतिक स्तर पर जीवन का यथार्थवादी चित्रण किया है. उनका निष्कर्ष एकदम सही है कि दलितों की संस्कृति 'श्रम पर आधारित' संस्कृति है. उनके दैनिक क्रियाकलापों, सामाजिक आचार-विचार-प्रथाओं, विश्वासों, मान्यताओं, रहन-सहन के तरीकों से वे इसे स्थापित करते हैं. दलितों के इस चित्रण से किसी को इंकार नहीं है. लेकिन जब वे इन आधारों को राजनैतिक-आंदोलनात्मक स्तर पर प्रक्षेपित करते हैं, तो बड़े विचित्र निष्कर्ष देते हैं.

मसलन, 'भूमिका' में वे कहते हैं --" एक समयावधि में ब्राह्मणवादी जातियां जातिहीन और वर्गहीन हो जायेंगी, तब हम एक समतावादी भारत की स्थापना करेंगे." लेकिन ब्राह्मणवादी जातियों के जातिहीन व वर्गहीन होने की क्या प्रक्रिया होगी, इस पर वे चुप्पी लगा जाते हैं. ऐसा इसलिए कि वे समूचे दलित समुदाय को आर्थिक स्तर पर शोषित वर्ग के समकक्ष मान लेते हैं. क्या केवल ब्राह्मणवादी जातियों को ही जातिहीन और वर्गहीन होने की जरूरत है, दलितों को नहीं? पूरी पुस्तक में वे इस बात का विस्तार से उल्लेख करते हैं कि दलित बहुजनों में भी किस तरह सामाजिक-सांस्कृतिक स्तर पर ब्राह्मणवाद ने घुसपैठ कर ली है -- न केवल दैनिक क्रियाकलापों में, बल्कि वैचारिक स्तर पर भी. वास्तव में तो समतावादी भारत की स्थापना की प्रक्रिया में ही जातिवाद और ब्राह्मणवाद से सामाजिक-सांस्कृतिक स्तर पर, तो राजनैतिक-आर्थिक स्तर पर वर्गीय शोषण से लड़ने की जरूरत होगी. उन्होंने सविस्तार इसका उल्लेख किया है कि किस प्रकार हिन्दूवाद 'सहयोजन' और 'बहिष्करण' के सिद्धांत पर काम करता है और जातियों को अपने में मिलाने हेतु घुसपैठ करता है. उन्होंने विस्तार से बताया है कि किस प्रकार नवक्षत्रियों के रूप में शूद्र उच्च जातियों का उभार हो रहा है और वे खुद को आक्रामक ढंग से हिन्दुत्व से जोड़ रहे हैं. वे कहते हैं, "कई दलित बहुजनों ने अपना संस्कृतिकरण करने के काफी प्रयास किये हैं. उन्होंने अपने वास्तविक नामों को ब्राह्मणवादी नामों में परिवर्तित कर लिया है. मुथैया मूर्ति बन गये हैं और गोपियाह गोपाल कृष्णन. ...ऐसे अनेकों दलित बहुजन अफसर, राजनेता, अकादमीशियन और डॉक्टर हैं, जिन्होंने हिन्दुओं से भी ज्यादा हिन्दू होने की कोशिश की है." (पेज 63)

वास्तव में स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान ही भारत के एक आधुनिक राष्ट्र में तब्दील होने की प्रक्रिया शुरू हुई थी. इसी समय साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष विकसित हुए, राष्ट्रवादी चेतना का उभार सामने आया, जातिविरोधी आंदोलन विकसित हुए और ब्राह्मणवाद विरोधी आंदोलन के रूप में उसने अपना आकार ग्रहण किया. राष्ट्रीय आंदोलन की मुख्य धारा -- जिसका नेतृत्व गांधीजी और कांग्रेस करते थे -- का मुख्य निशाना साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद ही था, उसने जातिवाद व इसे पैदा करने वाले सामाजिक-आर्थिक कारकों पर कभी गंभीरता से चोट करने की कोशिश नहीं की. गांधीजी ने तो स्वयं को वर्ण व्यवस्था को मानने वाले सनातनी हिन्दू के रूप में अपने को घोषित किया. यही कारण है कि --"(कांग्रेस) पार्टी के अंदर एक ऊंची जाति के हिन्दू और गैर-हिन्दू दलित बहुजन के बीच अंतर बना रहा. ...इसका कारण यही था कि हिन्दू नेता धार्मिक और सांस्कृतिक स्तर पर दलित बहुजनों के साथ लगातार किसी 'दूसरे' जैसा व्यवहार करते रहे. ...पार्टी की उपरली पांतों में उनकी प्रतिष्ठा बहुत ही कम बन पाई." (पेज 55)

महाराष्ट्र में जातिवाद विरोधी आंदोलन की धारा ज्योतिबा फुले के नेतृत्व में विकसित हुई और इसने ब्राह्मणवादी सर्वोच्चता को चुनौती दी. उन्होंने पूर्ण समानता की, दलित और स्त्री-शिक्षा की, विधवा विवाह की और नौकरशाही के दमन की मांग की. विचारधारात्मक रूप से यह कार्यक्रम गांधीवादी कार्यक्रम से बहुत आगे था, लेकिन ज्योतिबा की मृत्यु के बाद इस आंदोलन का चरित्र ख़त्म हो गया. बाद में कोल्हापुर के महाराज शाहू ने इसकी कमान संभाली और उन्होंने मांग की कि हमें भी 'क्षत्रिय' माना जायें. इस प्रकार शाहू महाराज खुद हिन्दुत्व के जाल में फंस गए. पेरियार ने भी जातिवाद के खिलाफ संघर्ष किया, लेकिन कोई सफलता नहीं मिली. असल में जात-पात विरोधी आंदोलन हमेशा साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलन और कृषि क्रांति के लिए संघर्ष से कटा रहा.

कांचा इलैया अपनी पुस्तक में इस बात को भी रेखांकित करते हैं कि हिन्दूवाद ने समग्र रूप से जो सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक संरचना बनाई है, वह किस कदर हिंसा पर आधारित है. इसके लिये वे हिन्दू देवी-देवताओं का उदाहरण देते हैं, जो कभी भी जनसमुदाय की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति नहीं देते, बल्कि विजेता बनकर हिंसा को न्यायसंगत ही ठहराते हैं. इस प्रकार हिन्दू धर्म में हिंसा एक सकारात्मक लोकाचार के रूप में ही स्थापित है और इसीलिए आधुनिक लोकतंत्र से उसका कोई लेना-देना नहीं है. वे कहते हैं --"ब्राह्मणवादी संस्कृति एक हिंसक और वर्चस्ववादी संस्कृति रही है. उसने दलित बहुजन उत्पादन ढांचों, संस्कृति, अर्थतंत्र और उसके सकारात्मक राजनीतिक ढांचों को बर्बाद किया है. ...उपनिवेशविरोधी संघर्ष को चलाते हुए ब्राह्मणवादी नेताओं और विचारकों ने जातिविरोधी समतावादी विचारधारा का निर्माण करने के लिए कोई कोशिश नहीं की. . इसके उलट उन्होंने बर्बर हिन्दू संस्कृति को बढा-चढ़ाकर पेश किया. ...इसके लिए उन्होंने एक नई विचारधारा की रचना की. यह विचारधारा थी -- ब्राह्मणवादी राष्ट्रवाद. इसको खड़ा करने के लिए उन्होंने ऊंची जातियों के वर्चस्व की पुनर्रचना की. इसके लिए उन्होंने मंडलविरोधी विचारधाराओं, अयोध्या आधारित राम संबंधी नारों और संघ परिवार के 'अखंड भारत' और 'अल्पसंख्यक तुष्टिकरण' के सिद्धांत का प्रयोग किया." (पेज 104-105). यह ब्राह्मणवादी राष्ट्रवाद संघी गिरोह का 'हिन्दू राष्ट्र' ही है. राष्ट्रवाद के नाम पर आज जितनी भी बहस चलाई जा रही है, वह वास्तव में ऊंची जातियों के वर्चस्व को बनाए रखने के लिए तथा दलित-अल्पसंख्यकों के दमन पर ही आधारित है.  

अम्बेडकर जैसा तीखा प्रहार जातिवाद पर फुले के बाद किसी ने नहीं किया. उन्होंने कांग्रेस के पाखंड का भी भंडाफोड़ किया. जातिवादी भेदभाव से मुक्त होने के लिए धर्मांतरण का भी रास्ता अपनाया. भारतीय संविधान भी उन्होंने ही बनाया, लेकिन दलितों की स्थिति में परिवर्तन लाने में वे नाकामयाब ही रहे. इससे स्पष्ट है कि जातिवाद के खिलाफ लड़ाई को जाति-संघर्ष से नहीं, बल्कि वर्ग-संघर्ष से ही जोड़ना होगा. भारतीय संदर्भ में जाति और वर्ग किस तरह से घुले हुए हैं, कांचा इलैया इसे इस तरह रेखांकित करते हैं, " एक अमीर माला या मडिग्ग और एक संपत्तिवान ऊंची जाति के व्यक्ति के बीच का संबंध कुछ-कुछ एक ऊंची जाति के गरीब व्यक्ति और एक गरीब दलित बहुजन के बीच के संबंध जैसा ही था. ऊंची जाति का एक गरीब आदमी हमेशा अपने-आपको ऊंची श्रेणी का ही मानता है. इसी प्रकार ऊंची जाति का अमीर आदमी भी अपने-आपको हमेशा ऊंचा ही मानता है. संपत्ति होने से एक वर्ग विशेष में आ जाने के बावजूद दलित बहुजनों की सामाजिक प्रतिष्ठा में कोई बदलाव नहीं आता है. अमीर वर्ग के भीतर भी जाति की भिन्नता बनी रहती है." (पेज 55)

वामपंथ ही है, जिसने आज़ादी के आंदोलन के दौरान और उसके बाद लगातार इस बात पर जोर दिया है कि वास्तविक कृषि क्रांति के बिना दलितों की और शोषितों की मुक्ति संभव नहीं है. जहां वामपंथ जातिवाद के खिलाफ लड़ाई को वर्ग-संघर्ष से जोड़ने पर बल देता है, वहीँ कांचा इलैया भारतीय समाज के समतावादी भविष्य की स्थापना के लिए समग्र समाज के दलितीकरण पर जोर देते हैं. यह कोई वर्गीय समाधान नहीं है और शोषणमुक्त समाज की स्थापना के लिए कोई आश्वस्ति भी नहीं है. आखिर एक समतावादी समाज को शोषणमुक्त समाज भी होना ही चाहिए.   
                                         (लेखक की टिप्पणी -- बतौर एक पाठक ही)





Wednesday, 6 July 2016

मुख्यमंत्री के नाम एक तुच्छ नागरिक का खुला पत्र

माननीय मुख्यमंत्री,
छत्तीसगढ़ शासन, रायपुर.
महोदय,
इस राज्य के मुख्य सेवक को इस देश के एक तुच्छ नागरिक का सलाम.
आशा है, मेरे संबोधन को आप व्यंग्य नहीं समझेंगे, क्योंकि देश के प्रधानमंत्री अपने आपको इस देश का प्रधान 'सेवक' ही बता रहे हैं. इस देश में प्रधानमंत्री से ऊपर और कौन हो सकता है? -- वे अपने आपको 'मालिक' कह सकते थे, लेकिन 'प्रधान सेवक' से ऊपर जाने को तैयार नहीं हैं. जैसे 'विकलांग' को उन्होंने 'दिव्यांग' से प्रस्थापित कर दिया, वैसे ही 'मंत्री' 'सेवक' से हो गया. सो, आपको मैं 'मुख्य सेवक' कहने की धृष्टता कर सकता हूं.
वैसे प्रधानमंत्रीजी का दावा है कि वे 125 करोड़ लोगों के 'प्रधान सेवक' है, लेकिन मुझे यह पता नहीं है कि उन 125 करोड़ लोगों में मैं शामिल हूं या नहीं. वैसे यह तो वे ही बता सकते हैं कि 125 करोड़ की उनकी गिनती में कौन-कौन लोग/समुदाय शामिल नहीं हैं? लेकिन यदि छत्तीसगढ़ के 2.5 करोड़ लोगों के आप मुख्य सेवक हैं, तो मुझे लगता है कि इस लंबी कतार का अंतिम व्यक्ति मैं तो जरूर ही हूंगा, जिसे आपकी सरकार उसे अपना नागरिक अधिकार छोड़ने या अंजाम भुगतने की धमकी दे रही है. लेकिन इस प्रदेश में कुछ सिरफिरे आज भी मौजूद हैं, जो अपना नागरिक अधिकार छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं और उनमें से एक मैं हूं. इसे आप एक तुच्छ नागरिक का 'हठ' मान सकते हैं. वैसा ही हठ, जिसके बारे में कहा जाता है कि वह हठ, 'राजहठ' से भी बड़ा होता है.
मुख्य सेवक को यह पत्र मैं अपने सभी साथियों की ओर से लिख रहा हूं. हम सब साथियों ने बार-बार बस्तर जाने की हठ ठानी है, भले ही आपका 'राजहठ' हम सबको 'माओवादी' घोषित करता रहे. इस देश का संविधान हमें एक नागरिक के रूप में बस्तर जाने की इजाज़त देता है, अपने राज्य और देश के लोगों से बात करने और उनकी समस्याओं को सुनने-समझने की अनुमति देता है और जरूरत पड़ी, तो उनकी मांगों के लिए उन्हें संगठित करने और जनतांत्रिक तरीके से आंदोलन करने का भी अधिकार देता है. अतः आपके 'राजदंड' की ताकत पर हम अपना नागरिक अधिकार खोने के लिए तैयार नहीं हैं.
हम जानते है कि बस्तर इस देश के उन कुछ खतरनाक और असुरक्षित जगहों में से एक है, जहां से सुरक्षित वापस लौटना संभव नहीं है. 'माओवादियों' और सुरक्षा बलों/पुलिस दोनों की गोलियों ने बस्तर का जीवन 'असुरक्षित' कर दिया है. आपके 'राजहठ' के लिए असली चुनौती यही है कि हम किसी की भी गोली का शिकार न होकर 'सुरक्षित' वापस कैसे लौट आये!! आपकी समझ है कि बस्तर को टाटा-बिडला-अडानी-एस्सार के भरोसे छोड़ दो -- वे बस्तर का विकास कर लेंगे. लेकिन इसके बाद भी कुछ लोग बस्तर जाने का साहस करें, तो ऐसे लोग 'विकासविरोधी' और 'देशद्रोही' ही हो सकते हैं !!...और ऐसे 'देशद्रोही' बस्तर जाकर सुरक्षित वापस आ जायें, तो वे 'माओवादी' के सिवा और कौन हो सकते हैं!!! ऐसे लोगों के खिलाफ 'राजदंड' का उपयोग नहीं होगा, तो 'देशसेवा' के 'राजहठ' का क्या होगा? मुख्य सेवक की हैसियत से आपने देशसेवा का व्रत लिया है, जनसेवा का नहीं. जनता के ऊपर देश है और देश तो बिन जनता के भी रह सकता है. सो, 'देशद्रोहियों' से निपटे बिना, जन सुरक्षा अधिनियम में उन्हें जेल में डाले बिना देश सेवा नहीं की जा सकती. यही असली 'राष्ट्रवाद' है -- प्रधान सेवक और मुख्य सेवक का.
महोदय, हमने तो सोचा था कि बवाल तो इस बात पर होगा कि हमने मुख्य सेवक की सेवा में कोई कसर कैसे निकाल ली? जिस सरकार को राज्य की सेवा के लिए अनगिनत पुरस्कार मिले हो, उसकी सेवा में इस देश के चार तुच्छ नागरिक कोई खोट निकाले, तो यह देशद्रोह के सिवा और क्या हो सकता है? हमारा सोचना था कि आप हमारे इस दावे को नकारेंगे कि मनरेगा में कोलेंग के लोगों को साल भर में केवल चार दिन ही काम मिला. जब हम लोगों को बतायेंगे कि दक्षिण बस्तर के ग्रामीणों की समस्त स्रोतों से पारिवारिक औसत आय 12000--30000 रूपये वार्षिक ही है, तो मुख्य सेवक हंसी बिखेरकर विनम्रतापूर्वक बतायेगा कि श्रीमान, राज्य का आर्थिक सर्वेक्षण बताता है कि इस प्रदेश में पारिवारिक आय औसतन लगभग 4 लाख रूपये वार्षिक है !! हमारी अपेक्षा यह थी कि राशन वितरण में अपनी उपलब्धियों का बखान करेंगे और हमारे सर्वे दल के इस अध्ययन को नकारेंगे कि आपकी नीतियों के कारण अधिकांश ग्रामीण परिवारों की राशन की मात्रा में कटौती हो गई है और इसके बावजूद राशन कार्डों की एंट्री बताती है कि महीनों से उन्हें अनाज नहीं मिला है और वे भुखमरी का शिकार हो रहे हैं. हम जहां भी गए, इस भारी अकाल में भी मुख्य सेवक की 'सेवा' के दर्शन नहीं हुए. लेकिन अब हमें अपने निष्कर्षों में इस निष्कर्ष को और जोड़ना पड़ रहा है कि किसी 'राष्ट्रवादी' सरकार की चिंता में ये तुच्छ सवाल और ऐसी तुच्छ समस्याएं नहीं होती. ऐसी तुच्छ खबर तो कुछ तुच्छ नागरिक ही ला सकते हैं.
महोदय, अपने भ्रमण में हमने देखा कि पूरे बस्तर में हर 2 से 5 किमी. पर एक शिविर बैठा हुआ है सुरक्षा के नाम पर. पर बताएं कि जिन आदिवासियों को उनकी वनभूमि से विस्थापित करके या जिनको उनकी राजस्व पट्टे की भूमि से भगाकर इन शिविरों को स्थापित किया गया है, वे आदिवासी अपने-आपको सुरक्षित कैसे समझें? एटेबालका का वह आदिवासी अपने को सुरक्षित कैसे समझेगा, जिसकी बेटी के साथ बलात्कार करके एसपीओ ने मुंह मोड़ लिया है, और जिसके खिलाफ थाने में की गई शिकायत को थानेदार, तहसीलदार व एसडीएम तीनों ने मिलकर जिन्दा दफना दिया? शिकायत तो जिन्दा दफ्न हो गई, लेकिन मुख्य सेवकजी आप ही बताईये, उस जिन्दा बच्चे को कहां दफ्न करें, जो आपके सुरक्षाकर्मी की काली करतूतों के कारण इस धरती पर आ चुका है!! वह नवजात और उसकी बलात्कृत मां अपनी जिंदगी जीने का केवल वह अधिकार मांग रही है, जो आपका कानून उसे दे सकता है. लेकिन शायद इस पीड़ित मां की कहानी आपके पास पहुंची नहीं होगी, क्योंकि आपने और आपके प्रशासन ने हमारी रिपोर्ट पढ़ी ही नहीं होगी. वे तो केवल इस बात में मशगूल है कि आपके 'राजदंड' का मजा हमें कैसे चखाया जाएं, ताकि आगे से हम या कोई और बस्तर जाने की हिम्मत भी न कर सकें.
आदरणीय मुख्य सेवकजी, मैं उस तमाशे और साजिश की कहानी को दुहराना नहीं चाहता, जो हमारे बस्तर से वापस आने के बाद आपकी कुशल पुलिस ने हमारे खिलाफ गढ़ने की कोशिश की है. जो आरोप आपके प्रशासन ने हम पर मढ़े हैं, उसकी असलियत --इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया-- दोनों ने सामने ला दी है. लेकिन इस साजिश से एक और सवाल पैदा होता है कि क्या बस्तर एक ऐसे पुलिस राज्य में तब्दील हो गया है, जहां आम नागरिकों के कोई नागरिक अधिकार सुरक्षित नहीं बचे हैं और पुलिस इस स्थिति में आ गई है कि एक लोकतांत्रिक राज्य की नीतियों को निर्देशित कर रही है? निश्चित ही आप इसे नकारेंगे. निश्चित ही आप ये सही दावा करेंगे कि ये जवान देश की सुरक्षा के लिए चाक-चौबंद रहते हैं और नक्सलियों के हाथों बर्बरतम तरीके से मारे जा रहे हैं. लेकिन इन तमाम बातों के होते हुए भी क्या सुरक्षा बलों को यह अधिकार मिल जाता है कि वे हमारी मां-बहनों के साथ बलात्कार करें, हमारे घर-गांव लूटे-जलाएं या फिर हमारे लोगों को 'केवल' माओवादी होने के संदेह में झूठे मुठभेड़ में मार गिराएं? मानवाधिकार आयोग से लेकर आदिवासी आयोग तक और एडिटर्स गिल्ड से लेकर तमाम स्वतंत्र रिपोर्टें तो यही बता रही है कि एक लोकतांत्रिक राज्य हाशिये पर पड़ा हुआ है और पुलिस/सुरक्षा बल ही सत्ता का केंद्र बन गए हैं. इन तमाम आयोगों ने और स्वतंत्र प्रेक्षकों ने पुलिस/सुरक्षा बलों की आम नागरिकों पर ज्यादतियों को बार-बार उजागर किया है और हर बार आपकी सरकार उनके खिलाफ कार्यवाही करने में असफल रही है.
मुख्य सेवकजी, हम आदिवासी भी इंसान हैं, भेड़-बकरी नहीं और एक इंसान की तरह जिन्दा रहने का हक हम आपसे मांग रहे हैं. उस कुमाकोलेंग की, जहां की तीन-चौथाई जनता माओवादी हमले के बाद गांव से ही भाग गई है, की गुहार सुन लीजिये कि हे सरकार, उन्हें माओवादियों के रहम पर मत छोडिये, उनके जान-माल की रक्षा कीजिये. हे सरकार, उन्हें स्कूल चाहिए, सड़क चाहिए, मनरेगा में काम चाहिए, राशन दुकान से अनाज चाहिए, बीमारी का ईलाज चाहिए.
मुख्य सेवकजी, यदि ये तमाम बातें करना 'देशद्रोह' है, तो बेशक हमें फांसी पर चढाईये. लेकिन हमारा विनम्र आग्रह है कि हमें उन बातों का आरोपी न बनाईये, जो हमने किया-कहा ही नहीं. बेशक, अपने 'राजदंड' का उपयोग कीजिये, लेकिन अपने 'राजहठ' में आदिवासियों को 'कार्पोरेट यज्ञ' की समिधा न बनाएं. इतिहास को याद रखिये, 'राजहठ' से बड़ा 'नागरिक हठ' होता है और हमारा हठ है कि आदिवासियों के हितों की रक्षा के लिए, उनके जल, जंगल, जमीन, खनिज की रक्षा के लिए हम आपके 'राजदंड' को बार-बार चुनौती देंगे -- 'देशद्रोह' के आरोपों का खतरा उठाकर भी. कृपया बस्तर पुलिस और प्रशासन को इस देश के नागरिकों के खिलाफ युद्ध करने का अधिकार देकर अपनी सरकार की भद्द न पिटवायें. बस्तर में क्या हो रहा है, उस पर पूरी दुनिया की नज़रें टिकी हुई है.
फिर से, इस राज्य के 'मुख्य सेवक' को प्रणाम.
आपका
संजय पराते
एक तुच्छ नागरिक

Tuesday, 19 April 2016

माओवादियों और राजकीय दमन के बीच पिसता बस्तर

माओवादियों और राजकीय दमन के बीच पिसता बस्तर
छत्तीसगढ़ इस राष्ट्रवादी षडयंत्रवादी सरकारी दिमाग की प्रयोगशाला है. सोनी सोरी, लिंगा, प्रभात की प्रताड़ना सिर्फ इसलिए कि वे असहाय कर दिए गए आदिवासियों के हक में काम कर रहे हैं. ओड़िशा में सारंगी, छत्तीसगढ़ में डॉक्टर जाना ! सूची बढ़ती जा रही है.
--- अपूर्वानंद, दिल्ली विवि के प्राध्यापक
जो कोई बेला और मुझे नक्सलवादी मानता है, वह निश्चित ही सच्चाई से कोसों दूर है. ...मैं न तो नक्सलवादी हिंसा का समर्थन करता हूं और न ही राजसत्ता द्वारा की जाने वाली हिंसा का. ...लोकतांत्रिक साधनों के जरिये अन्याय के सभी रूपों के प्रतिकार का मैं समर्थक हूं. मुझे 'विदेशी दलाल' बताया गया है. सच्चाई यह है कि मैं भारतीय नागरिक हूं. नक्सलवादी होने का आरोप एक बहाना भर है बेला को परेशान करने की असली वजह यह है कि उन्होंने कुछ हफ्ते पहले सुरक्षा बल के कुछ सदस्यों के खिलाफ बलात्कार और यौन-हिंसा की शिकायतें दर्ज कराने में बीजापुर जिले की कुछ आदिवासी महिलाओं की मदद की थी. इसके बाद से पुलिस-प्रायोजित सामाजिक एकता मंच जैसे समूहों ने बेला को निशाना बनाना शुरू कर दिया. ...बस्तर जैसी जगह में किसी पर नक्सलवादी होने का आरोप मढ़ना उसकी जान खतरे में डालने के बराबर है....
--- अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज, कैच न्यूज़ को दिए साक्षात्कार में.
ज्यां द्रेज और अपूर्वानंद के ये कथन बस्तर की वर्तमान स्थिति की भयावहता को बताने के लिए काफी है. इससे पहले 19 फरवरी को माकपा पोलिट ब्यूरो सदस्य बृंदा कारात ने मुख्यमंत्री रमनसिंह को पत्र लिखकर जगदलपुर लीगल एड ग्रुप के वकीलों, सामाजिक कार्यकर्ता बेला भाटिया, महिला पत्रकार मालिनी सुब्रमण्यम तथा राजनैतिक कार्यकर्त्ता सोनी सोरी पर किये जा रहे हमलों के खिलाफ हस्तक्षेप करने का आग्रह किया था.

इसी पृष्ठभूमि में माकपा नेताओं के एक प्रतिनिधिमंडल ने 17-18 मार्च को दक्षिण बस्तर का दौरा किया. इस दल का नेतृत्व माकपा संसदीय दल के सचेतक तथा आदिवासी अधिकार राष्ट्रीय मंच के कोषाध्यक्ष जीतेन्द्र चौधुरी कर रहे थे. प्रतिनिधिमंडल में जनवादी महिला समिति की नेता आशा लता तथा तापसी प्रहराज, पार्टी के छत्तीसगढ़ राज्य सचिव संजय पराते तथा सचिवमंडल सदस्य एम के नंदी, आदिवासी एकता महासभा के महासचिव बालसिंह और जन विज्ञान कार्यकर्ता पी सी रथ शामिल थे.

प्रतिनिधिमंडल के दौरे की सूचना राज्य प्रशासन को पहले ही दे दी गई थी. प्रशासन भी दौरे को विफल बनाने के लिए कमर कसे हुए था. उसने सोनी सोरी को घर से हटाने की नाकाम कोशिश की, उसने बीजापुर के नेंड्रा गांव में जाने से हतोत्साहित किया, उसने सुकमा के कुन्ना गांव में जाने के लिए सुरक्षा देने से ही इंकार कर दिया. लेकिन प्रशासन के इस रूख के बावजूद, प्रतिनिधिमंडल का दौरा सफल रहा. उसने इन दोनों दूरस्थ गांवों में जाकर हालात का जायजा लिया, ग्रामीणों तथा राजनैतिक कार्यकर्ताओं से बातचीत की और बलात्कार व यौन-उत्पीड़न की शिकार आदिवासी महिलाओं से मुलाक़ात की. इस दौरे को सफल बनाने में सीपीआई नेता मनीष कुंजाम तथा उनके साथियों रामा सोढ़ी, नंदाराम सोढ़ी, लक्ष्मण कुंजाम, कुसुम नाग, गंगाराम नाग, जी आर नेगी आदि का योगदान सराहनीय रहा.

सोनी सोरी से भेंट
माकपा प्रतिनिधिमंडल ने बीजापुर जाने से पहले दंतेवाड़ा जिले के गीदम में  सोनी सोरी से उनके घर में मुलाक़ात की. इस मुलाक़ात से पहले ही पुलिस ने उन्हें घर से जबरदस्ती हटाने की कोशिश की, जिसका उन्होंने तीखा विरोध किया. उन्होंने अपने ऊपर हुए हमले की विस्तार से जानकारी दी तथा जांच के नाम पर प्रशासन द्वारा किये जा रहे नाटक के बारे में भी बताया. सोनी सोरी के चेहरे को किसी रसायन से जलाए जाने के तथ्य के बाद भी, आज भी प्रशासन इसे महज चेहरे पर कालिख पोतना बता रहा है. उन्होंने बताया कि किस तरह उनके परिजनों को ही षडयंत्रकारी बताकर इस मामले में फंसाने की कोशिश की जा रही है.

सोरी की बहन धनेश्वरी जगदलपुर में नर्सिंग कोर्स कर रही है. उसे लगातार कॉलेज से उठाकर थाने ले जाया जाता है और न केवल डराया-धमकाया जाता है, बल्कि अश्लील बातें भी की जाती है. लिंगा कोड़ोपी ने मल्टीमीडिया में डिग्री कोर्स किया है, उन्हें लगातार एनकाउंटर की धमकियां दी जा रही हैं. अजय बघेल उनकी बुआ के लड़के हैं और पुलिस ने उन्हें इतना पीटा है कि ठीक-से चल-फिर नहीं पा रहे थे.

 सोनी सोरी पूछती हैं -- "मेरी गलती क्या है? जिन आदिवासियों के साथ अत्याचार हो रहा है, उन्हें इकठ्ठा करके अधिकारियों के पास जाकर न्याय मांगने में गलत क्या है? यदि मैं गलती कर रही हूं, तो मेरे घर वालों को परेशान क्यों किया जा रहा है?" वे कहती हैं कि अपने जले हुए चेहरे के साथ वह पूरे बस्तर को न्याय दिलाने की लड़ाई में जुटी रहेंगी.

सास-बहू दोनों से बलात्कार
यहां से हमारा दल बीजापुर जिले के नेंड्रा गांव की ओर बढ़ा. बीजापुर एसपी ने बताया कि उस गांव तक वाहन से जाना संभव नहीं है और हमें 10 किमी. पैदल ही चलना होगा. इस चुनौती को हमने स्वीकार किया. (बाद में पता चला कि माकपा दल के दौरे की सूचना के बाद स्वयं जिलाधीश इस गांव तक अपनी चौपहिया वाहन से गए थे.) तिम्मापुर थाने में हमने गाडी रोकी तथा पैदल चलने की तैयारी की. लेकिन एक महिला पत्रकार पुष्पा रोकड़े वहां मिल गई. इस परिचय के बाद कि अखबार के मालिक-संपादक से मेरी अच्छी जान-पहचान है, वह हमारे दल को गांव तक ले जाने के लिए तैयार हो गई. मानवाधिकार आयोग के सदस्यों को उसने ही गांव तक पहुंचाया था. हम अपने वाहन से ही नेंड्रा गांव तक पहुंचे. उस महिला पत्रकार की मदद से ही हमने ग्रामीणों को इकठ्ठा किया. जनवरी में ही सुरक्षा बलों ने इस गांव की महिलाओं के साथ बलात्कार किया था. इन बलात्कृत महिलाओं में वे सास-बहु भी थी, जिनसे हमारी मुलाक़ात हुई और उन्होंने स्पष्ट रूप से हमें बताया कि सुरक्षा बलों ने उनके साथ बलात्कार किया है. बलात्कार में शामिल एक सुरक्षा कर्मी (एसपीओ) का नाम भी उन्होंने बताया, जो कि पहले सलवा जुडूम कार्यकर्ता था. सुरक्षाकर्मियों ने उनके घरों को लूटा भी. इस घटना को उजागर करने के कारण ही बेला भाटिया पर हमला किया गया था. घटना के तीन माह बाद भी कांग्रेस-भाजपा का कोई नेता यहां नहीं पहुंचा और न ही बलात्कारियों पर ही कोई कार्यवाही हुई है.

पूरा गांव उजाड़-सा था. स्कूल नहीं, डॉक्टर नहीं, पीने का पानी नहीं. आंगनबाड़ी भवन अधूरा पड़ा है -- खंडहर में तब्दील होता हुआ. ग्रामीणों को इसके निर्माण की मजदूरी आज तक नहीं मिली. प्रशासन का कहना है -- मजदूरी बकाया नहीं, पैसों की कमी नहीं. इसे नक्सली बनने नहीं दे रहे, वे विकास कार्यों में बाधा डालते हैं. नजदीक का प्राइमरी स्कूल 8 किमी. दूर तिम्मापुर में है, बच्चों का जहां तक जाना संभव ही नहीं है. ग्रामीण मनरेगा को जानते भी नहीं, लेकिन पूरे जिले में इस वित्तीय वर्ष की 8-10 करोड़ रुपयों की मजदूरी बकाया है. ग्रामीणों को 35 किलो अनाज 100 रूपये में मिलता है, जबकि इसकी वास्तविक कीमत अन्त्योदय परिवारों के लिए 35 रूपये ही है. राशन दुकान से चावल के सिवा और कुछ नहीं मिलता --न नमक, न चना, न दाल, न शक्कर, न मिट्टी तेल. इस गांव की बैठक में लगभग 100 लोग इकठ्ठा थे, लेकिन किसी की भी सामाजिक सुरक्षा पेंशन तक पहुंच नहीं है. महिलाओं ने बताया कि जंगल में सुरक्षा बलों की लगातार मौजूदगी के कारण न वे घर बनाने के लिए घास-फूस ला पा रही हैं, न वनोपज बीनने जा पा रही हैं और न ही शौच के लिए जाना हो पा रहा हैं.
फिर वही कहानी
सुकमा के कुन्ना गांव की कहानी भी इससे अलग नहीं हैं. इस जिले के कोंटा ब्लॉक में 57 पंचायतें हैं. लेकिन कहीं भी रोजगार की गारंटी नहीं. छिंदगढ़ ब्लॉक में 46 पंचायतें हैं, लेकिन मनरेगा की 107 करोड़ रुपयों की मजदूरी बकाया है. आइसीडीएस के पुरूष अधिकारी आंगनबाड़ी का सामान हड़प लेते हैं और दोष कार्यकर्ताओं पर लगाते हैं. वर्ष 2002 के राशनकार्डधारियों को ही यहां सामाजिक सुरक्षा पेंशन मिल रही हैं और उनकी संख्या बहुत कम है.
12 जनवरी की सुबह इस गांव के पटेलपारा के लिए कहर बनकर आई. नक्सलियों की खोजबीन  के नाम पर सुरक्षा बलों के जवान दो दिन से भुसारास कैम्प में रुके थे. सुबह 9 बजे वे गांव पर टूट पड़े. जिसे देखा, बर्बरतापूर्वक मारा-पीटा, घरों को लूटा --उनका अनाज, उनके पशु-पक्षी, उनके जेवर-- सब कुछ. लेकिन वे केवल सामान लूटने के लिए ही नहीं आये थे, उन्होंने महिलाओं की iइज्जत भी लूटी. 8 महिलाओं को उन्होंने निर्वस्त्र कर डाला, उनसे बलात्कार की कोशिश की, उनके स्तनों को दबाकर दूध निकाला और जिन महिला-पुरूषों ने उनका विरोध किया, उन्हें बेदम पीटा. इस पिटाई के कारण दूसरे दिन ही सोड़ी हुंगा की मृत्यु हो गई. इस घटना में भी सलवा-जुडूम कार्यकर्त्ता --जो अब पुलिस जवान बन गए हैं-- शामिल थे. पीड़ित महिलाओं ने हमें अपनी आप-बीती सुनाई और दोषियों को नाम से भी चिन्हित किया. प्रशासन द्वारा इस घटना को दबाने की कोशिश की गई. आदिवासी महासभा (सीपीआई) के नेतृत्व में 22 जनवरी को कलेक्ट्रेट घेराव के बाद ही 27 जनवरी को पुलिस ने "अज्ञात फ़ोर्स के जवान" के खिलाफ आईपीसी की सामान्य धाराओं में जुर्म दर्ज किया, लेकिन अभी तक कोई कार्यवाही नहीं हुई हैं.

कुन्ना जाने से रोकने की कोशिश
हमारा दल 18 मार्च की सुबह बचेली से कुन्ना के लिए रवाना हुआ था. प्रशासन को रास्ते के बारे में जानकारी दे दी गई थी कि ग्राम भुसारास से दूधीरास होते हुए कुन्ना जायेंगे. भुसारास से कुन्ना गांव की दूरी 9 किमी है. लेकिन इस रास्ते से प्रशासन हमें ले जाने के लिए तैयार नहीं हुआ. इसके बजाये छिंदगढ़, कूकानार होते हुए वह हमें कुन्ना पहुँचाना चाहता था. यह दूरी 90 किमी. है. प्रशासन की मंशा स्पष्ट थी कि हम लोग इस गांव में पहुंचे ही नहीं. तब हमने दो भागों में बंटना उचित समझा. मैं और रथ छोटे रास्ते से कुन्ना पहुंचे. हमने गांव वालों से बातचीत की. बाकी साथियों ने प्रशासन से सहयोग किया, लेकिन कूकानार पहुंचने के बाद पुलिस प्रशासन ने कुन्ना जाने से रोक दिया. प्रशासन ने बताया कि नक्सली वहां भयंकर बम विस्फोट कर रहे हैं और गोलियां चल रही हैं और वे हमारे दल को सुरक्षा देने में असमर्थ हैं. ऐसी हालत में जीतेन्द्र चौधुरी ने बिना सुरक्षा बलों के कुन्ना जाने की ठानी. वे कुन्ना पहुंचे, लेकिन निर्धारित समय से तीन घंटे देरी से. दोनों रास्ते निरापद थे, न कहीं विस्फोट, न कहीं गोली. प्रशासन की मंशा साफ़ थी, लेकिन हमारे इरादे भी अटल थे.

कुन्ना में लगभग डेढ़ हजार ग्रामीणों की सभा को चौधुरी व अन्य साथियों ने संबोधित किया. ये ग्रामीण कुंदनपाल, मिसवार, डब्बा तथा कुन्ना पंचायतों से आये थे. आदिवासियों पर हो रहे अत्याचारों की तीखी भर्त्सना करते हुए हमने उन्हें आश्वस्त किया कि उनकी बातें संसद और संबंधित मंत्रियों-अधिकारियों तक पहुंचाई जायेगी.
जगदलपुर लौटकर जीतेन्द्र चौधुरी ने पत्रकार वार्ता में हिस्सा लिया. गांवों की आंखों-देखी को विस्तार से बताते हुए उन्होंने कहा कि सशस्त्र बलों के एक छोटे-से हिस्से द्वारा जिस प्रकार आदिवासियों पर अत्याचार किया जा रहा है, उससे समूचा बल बदनाम हो रहा है और भाजपा सरकार को चाहिए कि ऐसे तत्वों की पहचान कर उन्हें कड़ा दंड दें. उन्होंने कहा कि विकास के लिए शांति पूर्व शर्त है. इसलिए माओवादियों को हिंसा छोडनी होगी और सरकार को भी मानवाधिकारों के दमन पर रोक लगाना होगा तथा विरोध की लोकतांत्रिक प्रक्रिया को बढ़ावा देना होगा. सरकार को असहमति की आवाज़ भी सुननी होगी तथा बुनियादी सुविधाओं तक नागरिकों की पहुंच को सुनिश्चित करना होगा. उन्होंने बस्तर में आदिवासी वनाधिकार क़ानून को लागू करने तथा प्राकृतिक संपदा की लूट को रोककर जल, जंगल, जमीन पर आदिवासियों के परंपरागत अधिकारों को स्थापित करने की भी मांग की. उन्होंने उद्योगों के नाम पर आदिवासियों की हड़पी गई भूमि को भी वापस करने की मांग की.

प्रतिरोध की आवाजें
18 मार्च को ही 'बस्तर बचाओ संघर्ष समिति' के बैनर तले राजधानी रायपुर में एक प्रदर्शन किया गया. इसमें अन्य वामपंथी पार्टियों व संगठनों के साथ माकपा भी शामिल थी. बस्तर को छत्तीसगढ़ के नागरिकों की चिंता के केन्द्र में लाना इसका मुख्य उद्देश्य था. सभा को धर्मराज महापात्र, सोनी सोरी, विजय भाई, एन के कश्यप व अन्य गणमान्य नागरिकों ने संबोधित किया व अपनी गिरफ्तारियां दी. एक प्रतिनिधिमंडल ने राज्यपाल को ज्ञापन देकर नागरिक अधिकारों के दमन पर रोक लगाने की मांग की.

बस्तर की भयानक सच्चाई को प्रकारांतर से नक्सल अभियान के विशेष महानिदेशक डी एम अवस्थी को भी स्वीकार करना पड़ा है. अपने पत्र में उन्होंने बस्तर के 7 पुलिस अधीक्षकों को निर्देशित किया है कि नक्सलविरोधी अभियान के दौरान महिलाओं व बेक़सूर लोगों के साथ किसी तरह की छेड़छाड़ न की जायें, किसी भी सूरत में निर्दोष व्यक्ति या पकड़े हुए व्यक्ति का एनकाउंटर न किया जाए और किसी दोषी व्यक्ति को पकड़ा जाता है, तो उसे गिरफ्तार कर विधि-सम्मत कार्यवाही की जाएं.

ग्रामीण आदिवासियों पर सुरक्षा बलों द्वारा जारी बर्बर अत्याचारों की पुष्ट घटनाओं के सामने आने तथा इन्हें उजागर करने वाले बस्तर में कार्यरत सामाजिक-राजनैतिक-मानवाधिकार कार्यकर्ताओं , पत्रकारों व वकीलों पर हुए पुलिस-संरक्षित हमलों के हो-हल्ले के बाद ये निर्देश दिए गए हैं. पत्रकार प्रभात सिंह व दीपक जायसवाल की गिरफ़्तारी तथा बीजापुर व सुकमा जिलों में आदिवासी महिलाओं के साथ बलात्कार पर विधानसभा में जबरदस्त हंगामा हुआ है, एडिटर्स गिल्ड ने इन मामलों का स्वतः संज्ञान लिया है तथा प्रेस कौंसिल और मानवाधिकार आयोग को भी हस्तक्षेप करना पड़ा है.
पत्रकारों को प्रताड़ित करने की शिकायतों के निराकरण के लिए बनी राज्य स्तरीय कमिटी की पहली बैठक में यह ही तय नहीं हो पाया कि पत्रकार किसे माना जाएं? लेकिन माओवाद को कुचलने के नाम पर सरकारी संरक्षण में किये जा रहे दमन के खिलाफ प्रतिरोध की आवाजें लगातार उठ रही हैं और भाजपा सरकार को बैकफुट पर आना पड़ा है.

प्राकृतिक संसाधनों की लूट
बस्तर प्राकृतिक संसाधनों की लूट का चारागाह बन गया है. माओवाद से निपटने के नाम पर जिस प्रकार से सैन्य बलों व पुलिस को निर्दोष आदिवासियों को लूटने तथा उनके मानवाधिकारों को कुचलने की इजाज़त दी जा रही है, वह किसी भी सभ्य समाज को स्वीकार्य नहीं होगा. इससे नक्सलियों को पैर फैलाने का मौका भी मिल रहा है. लेकिन यह सब किया जा रहा है, तो महज इसलिए कि प्राकृतिक संसाधनों की लूट को सुनिश्चित किया जा सकें. लेकिन बस्तर के आदिवासी आज भी जल, जंगल, जमीन से जुड़े अपने हकों के लिए लड़ रहे हैं, और यही कारण है कि बंदूक की नोंक पर लोहंडीगुडा के आदिवासियों की जमीन छीनने के बावजूद टाटा अपना स्टील प्लांट यहां लगा नहीं पाया है. बैलाडीला में लौह-अयस्क खनन के लिए टाटा को जो प्रोस्पेक्टिंग लाइसेंस दिया गया था, वह भी निरस्त हो चुका है और अब टाटा का स्टील प्लांट लगने की संभावना नगण्य ही है. इसके बावजूद सरकार आदिवासियों की अधिग्रहित जमीन को भू-अधिग्रहण क़ानून की शर्तों के अनुसार लौटाने के लिए तैयार नहीं है.

सलवा-जुडूम अभियान के कारण बस्तर के 650 से ज्यादा गांव लगभग वीरान हो गए हैं. आदिवासियों की जनसंख्या में इस अभियान के कारण भारी गिरावट आई है और कुछ जातियां तथा बोलियाँ तो विलुप्ति की कगार पर पहुंच गई है. बस्तर आदिम संचय की पूंजीवादी प्रक्रिया का एक जबरदस्त उदाहरण बनाकर सामने आ रहा है.

इस प्रक्रिया ने बस्तर को दो भागों में बांट दिया है. एक प्रभावशाली राजनैतिक-सामाजिक-आर्थिक तबका है, जिसमें मध्य वर्ग का एक हिस्सा भी शामिल है, जो बहती गंगा में हाथ धोना चाहता है और जो 'आदिम संचय' की इस प्रक्रिया में ही अपना विकास देखता है. वह चाहता है कि बस्तर की संपदा को आदिवासी उन्हें चुपचाप सौंप दें और विरोध की किसी भी आवाज़ को सरकारी दमन से दबा दें. दूसरा तबका वह विशाल आदिवासी और ग्रामीण समुदाय है, जो अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है और जिसके पास खोने को कुछ नहीं है. वह माओवादियों से भी लड़ रहा है और माओवादियों को कुचलने के नाम पर उन पर हो रहे राजकीय दमन के खिलाफ भी संघर्ष कर रहा है.

भाजपा सरकार द्वारा प्रायोजित सलवा-जुडूम अभियान, जिसे महेंद्र कर्मा के नेतृत्व में कांग्रेस के एक बड़े हिस्से का भी समर्थन प्राप्त था, इसी लूट को सुगम बनाने का अभियान था. इस अभियान के दौरान सलवा-जुडूम के कथित लड़ाकों ने बड़े पैमाने पर घर लूटे, गांव जलाए, महिलाओं से बलात्कार किया, फर्जी एनकाउंटर किये और एक बड़ी आबादी को राहत शिविरों में रहने के लिए बाध्य किया. आदिवासियों के विस्थापन से 650 गांव खाली हो गए. जो लोग सलवा-जुडूम कार्यकर्त्ता बने, वे ऐसे 'आत्म-समर्पित' नक्सली थे, जो पहले माओवादियों के साथ मिलकर लूट-खसोट करते थे. सलवा-जुडूम अभियान ने उनकी लूट तथा गुंडागर्दी को राजनैतिक-प्रशासनिक संरक्षण दिया. सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस अभियान को 'अवैध' घोषित करने के बाद अब ये तत्व पुलिसकर्मी बनकर सैन्य-बलों के साथ मिलकर लूटपाट कर रहे हैं.

माओवादियों को कुचलने के नाम पर आज बस्तर में सशस्त्र बलों की 40 से अधिक कंपनियां तैनात हैं और हर 50 नागरिकों पर एक बंदूकधारी जवान. इस प्रकार समूचा बस्तर सैन्य छावनी में बदल गया है. सैंकड़ों करोड़ रूपये केन्द्र व राज्य सरकारों द्वारा हर साल झोंके जा रहे हैं और यह आबंटन भ्रष्टाचार का एक बड़ा स्रोत बन गया है. प्रशासनिक अधिकारियों का भी एक हिस्सा अब यह नहीं चाहता कि माओवादियों का खात्मा हो. माओवादी होंगे, तो फंड होगा और विकास के नाम पर बिना विकास किये इस फंड का गबन संभव होगा. बड़े पैमाने पर 'ईनामी नक्सलियों' का आत्म-समर्पण होगा और इस बहाने कईयों की पदोन्नतियां भी पक्की होंगी.

फर्जी आत्म-समर्पण में बढ़ोतरी
एसआरपी कल्लूरी के बस्तर आईजी बनने के बाद 'आत्म-समर्पण' एक आकर्षक काम बन गया है. दिसंबर 2014 की 'इंडियन एक्सप्रेस' की एक रिपोर्ट बताती है कि जनवरी 2009 से मई 2014 के बीच 65 महीनों में बस्तर में केवल 139 नक्सलियों ने समर्पण किया था, लेकिन जून-नवम्बर 2014 के बीच के 6 महीनों में 'कल्लूरी राज' में 377 आत्म-समर्पण हो जाते हैं और इसमें भी नवम्बर 2014 में ही 155 आत्म-समर्पण !! अखबार की छानबीन के अनुसार इनमें से 270 लोगों का नक्सली के रूप में कोई पुलिस रिकॉर्ड ही नहीं था. इसीलिए इनमें से किसी को पुनर्वास/ मुआवजा भी नहीं मिला. लगभग 100 लोगों को 2-5 हजार रुपयों तक की ही मदद मिली तथा केवल 10 को चतुर्थ श्रेणी की नौकरी. स्पष्ट है कि आत्म-समर्पण में भी बड़े पैमाने पर 'फर्जीवाड़ा' किया जा रहा है. इस प्रकार एक सामान्य नागरिक के भी नागरिक अधिकारों व उसके इज्जत से जीने के अधिकार को ही बड़े पैमाने पर कुचलकर कुछ लोगों की तकदीर चमकाई जा रही है.

एक नए सलवा-जुडूम का आगाज़
सुप्रीम कोर्ट द्वारा प्रतिबंधित किये जाने के बावजूद नए-नए रूपों में सलवा-जुडूम अभियान को पुनर्जीवित करने की कोशिशें जारी हैं. अब पुलिस प्रशासन के संरक्षण में नक्सलविरोध के नाम पर लंपट तत्वों को एकत्रित कर 'सामाजिक एकता मंच' का गठन किया गया है. ऐसा आरोप लगाया जा रहा है कि इसकी फंडिंग भी पुलिस ही कर रही है और यह सोशल मीडिया में भी पुलिस के पक्ष में आतंक का अभियान चलाने में सक्रिय है.

बाहरहाल, पिछले छः महीनों के दौरान इसने एक ऐसे संगठित गिरोह का रूप ले लिया है, जो नक्सलविरोध के नाम पर क़ानून अपने हाथों में लेकर कथित नक्सल-समर्थक लोगों को सबक सीखाने का काम कर रही है. अब किसी की हत्या को जायज ठहराने के लिए उस पर नक्सल-समर्थक होने का ठप्पा लगाना ही काफी है. इस संगठन ने बस्तर में आदिवासी-हितों के लिए तथा यहां की प्राकृतिक संपदा की लूट के खिलाफ काम करने वाले तमाम लोगों को, जिनमें वकील, पत्रकार, सामाजिक-राजनैतिक-मानवाधिकार कार्यकर्त्ता आदि शामिल हैं, खुले हमले किये हैं तथा उन्हें बस्तर छोड़ने को बाध्य किया है. 'असली माओवादियों' से लड़ने की जगह ये जनता से ही लड़ रहे हैं. इसलिए समय रहते सरकारी संरक्षण में पल रहे ऐसे संगठनों व तत्वों की गतिविधियों पर रोक लगाने की जरूरत है.

खौफ में जी रहे हैं पत्रकार
हमारे दौरे से पहले एडिटर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया की फैक्ट फाइंडिंग टीम ने 13-15 मार्च तक बस्तर का दौरा किया था. इसने बड़ी संख्या में वहां के पत्रकारों से बात की, जिनमें से एक सुब्बा राव को छोड़कर सभी ने यह स्वीकार किया कि वे स्वतंत्र रूप से रिपोर्टिंग नहीं कर पा रहे हैं, क्योंकि उन पर पुलिस औए नक्सलियों दोनों का दबाव रहता है. उनके फोन टेप किये जाते हैं और अघोषित रूप से निगरानी रखी जाती हैं. प्रतिष्ठित अखबार 'देशबंधु' के संपादक ललित सुरजन ने टीम को बताया कि अगर आप स्वतंत्र रूप से तथ्यों का विश्लेषण करना चाहे, तो वे सीधे-सीधे पूछते हैं कि आप सरकार के साथ हो या माओवादियों के? बीबीसी के पत्रकार आलोक पुतुल ने जब एक खबर के लिए एसआरपी कल्लूरी का पक्ष जानना चाह, तो उन पर न सिर्फ पक्षपातपूर्ण रिपोर्टिंग का आरोप लगाया गया, बल्कि यह भी कहा गया कि 'देशभक्त' मीडिया पुलिस के साथ हैं. इसके बाद उन्हें तुरंत वह इलाका छोड़ देने की धमकी दी गई.

और यह 'देशभक्त' मीडिया कौन है? ये सुब्बा राव हैं, जो दो दैनिक अखबारों के कथित रूप से संपादक हैं और 'सामाजिक एकता मंच' के संयोजक भी हैं. एडिटर्स गिल्ड की टीम को उन्होंने बताया कि मूल रूप से वह एक ठेकेदार हैं और कई सरकारी काम उनके पास हैं. इन महाशय को ही पत्रकारिता के पेशे में पुलिस से कभी कोई दिक्कत नहीं आई. इस मंच के दूसरे नेता मनीष पारख है, जो जगदलपुर से भाजपा विधायक संतोष बाफना के रिश्तेदार हैं और राजस्थान के निवासी हैं. बेला भाटिया को 'बाहरी' कहकर हमला करने वालों में इनकी प्रमुख भूमिका थी.

राजनैतिक पहलकदमी जरूरी
आज बस्तर माओवादियों और राजकीय दमन के बीच पिस रहा है और निर्दोष आदिवासी इसके बर्बर शिकार हो रहे हैं. इसलिए आज यहां एक ऐसी राजनैतिक पहलकदमी की जरूरत है, जो शांति व विकास के लक्ष्य को केन्द्र में रखकर ऐसी जनतांत्रिक प्रक्रिया को उन्मुक्त करें, जो आम जनता के राजनैतिक, नागरिक व मानवाधिकारों को तरजीह दें तथा राजकीय दमन के खिलाफ जनतांत्रिक विरोध की आवाज को जगह दें. नक्सलवाद के खिलाफ लड़ने के लिए एक व्यापक राजनैतिक सहमति बनाने के लिए ' राजनैतिक असहमतियों ' का आदर किये बिना सरकार आम जनता का विश्वास नहीं जीत सकती. लेकिन भाजपा सरकार से क्या यह अपेक्षा की जा सकती हैं कि वह जनतंत्र की रक्षा के लिए मानवाधिकारों तथा नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करेगी?

बाबा साहेब की प्रासंगिकता

बाबा साहेब की प्रासंगिकता 

डॉ. बाबा साहेब अम्बेडकर भारतीय समाज के दलित-शोषित-उत्पीड़ित तबकों के विलक्षण प्रतिनिधि थे, जिन्होंने हिन्दू धर्म में जन्म तो लिया, लेकिन एक हिन्दू के रूप में उनका निधन नहीं हुआ. एक हिन्दू से गैर-हिन्दू बनने की उनकी यात्रा उनकी स्थापित मूर्तियों में साकार होती हैं, जिसमें वे पश्चिमी पोशाक के साथ संविधान हाथ में लेकर, आधुनिक भारतीय समाज का दिशा-निर्देशन करते दिखते हैं. लेकिन उनकी यह यात्रा महज उनकी व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है, बल्कि वे समूचे भारतीय दलित-वंचित तबकों के दमन के विरूद्ध संघर्षों के नायक के रूप में सामने आते हैं. दलित-वंचित तबकों का यह संघर्ष केवल जातिवाद की बेड़ियों से मुक्ति के लिए नहीं है, इस संघर्ष में केवल आर्थिक पिछड़ेपन को दूर करने का सवाल ही निहित नहीं हैं; बल्कि यह संघर्ष एक ऐसी समाज-व्यवस्था के निर्माण का संघर्ष हैं, जहां मनुष्य को मनुष्य के रूप में सम्मान और इज्जत मिले, जहां पददलित-वंचित तबके के लोगों को मानवीय गरिमा के साथ जीने और अपना समग्र विकास करने का अधिकार मिले. ऐसी व्यवस्था के निर्माण के संघर्ष के सामाजिक-राजनैतिक-आर्थिक और सांस्कृतिक आयाम होते हैं.

इस दृष्टि से बाबा साहेब ने जिस संघर्ष की शुरूआत की थी, वह संघर्ष आज भी अधूरा है और अपनी मंजिल पाने को लड़ रहा है. देश की राजनैतिक आज़ादी के बाद भी वह संघर्ष अधूरा है, तो इसलिए कि हमारे शासक वर्ग ने "गोबर के ढेर पर महल का निर्माण" करने की कोशिश की. नतीजा, आज़ादी के बाद और संविधान के दिशा-निर्देशन के बाद भी, एक ऐसे समतावादी समाज के निर्माण में हम असफल रहे हैं, जो सामाजिक न्याय और दलित-वंचित तबकों की मानवीय गरिमा को सुनिश्चित कर सके.

20 नवम्बर, 1930 को गोलमेज अधिवेशन में बाबा साहेब ने अंग्रेजी साम्राज्यवाद की इन शब्दों में मुखालफत करते हुए 'राजसत्ता' पर अधिकार की मांग की थी -- "... अंग्रेजों के आने के पहले हमारी दलितों की जो स्थिति थी, उसकी तुलना यदि हम आज की परिस्थितियों से करते हैं, तो हम पाते हैं कि आगे बढ़ने के बजाये हम एक स्थान पर कदमताल कर रहे हैं. अंग्रेजों के आने के पहले छुआछूत की भावना के चलते हमारी सामाजिक स्थिति घृणास्पद थी. उसे दूर करने के लिए ब्रिटिश सरकार ने कुछ किया क्या? अंग्रेजों के आने से पहले हमें मंदिरों में प्रवेश नहीं मिला था. वह हमें आज मिल रहा है क्या?..."
अम्बेडकर आज जीवित होते, तो फिर यही सवाल करते कि आज़ादी से पहले जो स्थिति दलित-वंचितों की थी, आज भी वह जस-की-तस है, तो क्यों? क्यों आज रोहित वेमुला आत्म-हत्या कर रहे हैं और क्यों दलित-दमन के अपराधी कोर्टों से बाइज्जत बरी हो रहे हैं?? क्यों आज भी दलित और महिलायें मंदिर प्रवेश के लिए संघर्ष कर रही हैं और क्यों संवैधानिक प्रावधानों के बावजूद आज नौकरियों में आरक्षित सीटें खाली है??? वे यह भी पूछते कि आज संविधान की जगह मनुस्मृति को स्थापित करने की कोशिशें क्यों चल रही हैं और क्यों आज भी जनता का बहुमत तबका आर्थिक न्याय और न्यूनतम वेतन तक से वंचित हैं?

आज बाबा साहेब नहीं हैं, लेकिन इन सवालों का जवाब अब अंग्रेजों को नहीं , संघ-निर्देशित भाजपा सरकार को देना है, जिसके मुखिया नरेन्द्र मोदी हैं. यही वह संघी गिरोह हैं , जो 'फेंकने' में तो आगे हैं, लेकिन वास्तविकता यही है कि बाबा साहेब के ' धर्म-निरपेक्ष भारत ' को, ' हिंदू राष्ट्र ' में बदलने के लिए ज़हरीला अभियान चला रही है, जिसके बारे में बाबा साहेब ने कहा था -- " अगर इस देश में हिन्दू राज स्थापित होता है, तो यह एक बहुत बड़ी आपदा होगी. ... हिन्दू धर्म स्वतंत्रता का दुश्मन है. हिंदूराज को किसी भी कीमत पर रोका जाना चाहिए." जो चुनौती बाबा साहेब के सामने थी, वही चुनौती अपने आकार में कई गुना बढ़कर आज हमारे सामने उपस्थित हैं. बकौल, के सी सुदर्शन (संघ के पूर्व सरसंघचालक) -- " भारत का संविधान हिन्दूविरोधी है. ... इसलिए इसको उठाकर फेंक देना चाहिए और हिन्दू ग्रंथों के पवित्र ग्रंथों पर आधारित संविधान को लागू किया जाना चाहिए." इसीलिए संघी गिरोह गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित करने का अभियान चलाता है, जिसे अम्बेडकर ने 'प्रतिक्रांति का दर्शन' कहा था. इसीलिए जब-जब संविधान पर संघी गिरोह हमला करता है और उसकी समीक्षा करने की बात करता है, इस देश के दलित-उत्पीड़ित-वंचित तबके 'मनुस्मृति' को जलाने के लिए आगे आते हैं. प्रकारांतर से यह लड़ाई एक पुरातनपंथी वर्ण व्यवस्था को स्थापित करने के प्रयत्नों के खिलाफ एक वैज्ञानिक-चेतना संपन्न समतावादी आधुनिक भारत के निर्माण के प्रयास के लिए संघर्ष में तब्दील हो जाती है.

यह संघर्ष कितना कटु है, इसका अंदाज़ केवल इस तथ्य से लगा सकते हैं कि संघी गिरोह भारतीय जन-मानस में आये किसी भी प्रगतिशील-वैज्ञानिक चेतना के अंश को मिटा देना चाहता है. 6 दिसंबर, जो कि बाबा साहेब का निर्वाण दिवस भी है, को बाबरी मस्जिद का विध्वंस कोई आकस्मिक कार्य नहीं, बल्कि सुनियोजित षडयंत्र था. यह संघी कुकृत्य बाबा साहेब के संविधान पर हमला भी था और उनकी स्मृति को जनमानस से पोंछने का प्रयास भी. आज वे बाबा साहेब की समूची विचारधारा को हड़पने का अभियान चला रहे हैं और इस क्रम में हास्यास्पदता की हद तक जाकर वे उन्हें संघ-संस्थापक डॉ. हेडगेवार के 'सहयोगी' के रूप में चित्रित कर रहे हैं तथा दुष्प्रचार कर रहे हैं कि उन्हें संघ की विचारधारा में विश्वास था. जबकि बाबा साहेब के किसी भी सामाजिक-राजनैतिक अभियान/संघर्षों में 'काली टोपी, खाकी निक्कर'-वालों की कोई भागीदारी नहीं मिलती. अम्बेडकर तो क्या, देश के किसी भी स्वाधीनता संग्राम सेनानी से साथ संघियों का कभी कोई इन संबंध ही नहीं रहा हैं, क्योंकि इस समूची अवधि में 1925 से लेकर 1947 तक वे अंग्रेजों के साथ ही खड़े रहे और स्वतंत्रता सेनानियों के खिलाफ अंग्रेजों की मुखबिरी करते रहे. आज़ादी के बाद भी, हिन्दू कोड बिल के मामले में उन्होंने बाबा साहेब के पुतले जलाने तथा उन्हें धिक्कारने का ही काम किया था.

इस प्रकार, बाबा साहेब की विचारधारा का संघी गिरोह की 'वर्णाश्रमी समाज-व्यवस्था और हिन्दू-राष्ट्र के निर्माण की कल्पना'-वाली विचारधारा से सीधा टकराव है. दलित-शोषित-उत्पीड़ित व वंचितों का अपने अधिकारों के लिए संघर्ष जितना तेज होगा, यह टकराव भी उतना ही बढेगा.

इस संघर्ष को तेज करने और आगे बढ़ने के लिए मनुष्य को शोषण से मुक्त करने की चाहत रखने वाली सभी ताकतों को एक साथ आना होगा. अपने जीवन काल में ही अम्बेडकर ने इसे समझ लिया था. 1927 में महाड के तालाबों के पानी के लिए जो विशाल सत्याग्रह हुआ और जिसमें 'मनुस्मृति' को जलाया गया, उस आंदोलन में ब्राह्मणों के शामिल होने के बारे में बाबा साहेब ने कहा था --" जन्म से ऊंची और नीची भावनाओं का बना रहना ही ब्राह्मणवाद है. ...हम ब्राह्मणों के खिलाफ नहीं हैं. हम ब्राह्मणवाद के विरोधी हैं. ...हमारे इस आंदोलन में कोई भी, किसी भी जाति का व्यक्ति भाग ले सकता है."

उल्लेखनीय है कि बाबा साहेब के जीवन में उदार और ब्राह्मण समाज-सुधारकों का भी बहुत योगदान रहा था. स्वयं बाबा साहेब ने 'अम्बेडकर' सरनेम एक ब्राह्मण शिक्षक से लिया था, जो एक नेक दिल इंसान थे और जिन्होंने उनकी पढ़ाई में काफी मदद की थी.

बाबा साहेब के चिंतन का दायरा केवल जाति-दायरे तक सीमित नहीं था. अपने सामाजिक चिंतन को उन्होंने अर्थनीति और राजनीति से भी जोड़ा. उन्होंने किसानों व मजदूरों का मुद्दा उठाया, कम्युनिस्टों द्वारा हडताल का समर्थन किया तथा कोंकण में जमींदारी प्रथा का विरोध किया. उन्होंने जिस पहली राजनैतिक पार्टी -- इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी -- का गठन किया तह, उसका झंडा कम्युनिस्ट पार्टी के झंडे की तरह ही लाल रंग का था. उन्होंने कहा, " राजनीति वर्ग चेतना पर आधारित होनी चाहिए. जिस राजनीति में वर्ग चेतना ही न हो, वह राजनीति तो महज ढोंग है. इसलिए आपको ऐसी राजनैतिक पार्टी से जुड़ना चाहिए, जो वर्गीय हितों व वर्गीय चेतना पर आधारित हो."

13 फरवरी, 1938 को नासिक में रेलवे दलित वर्ग कामगार सम्मलेन में बोलते हुए उन्होंने कहा --" मेरे ख्याल से ऐसे दो शत्रु हैं, जिनसे इस देश के मजदूरों को निपटना ही होगा. वे दो शत्रु हैं -- ब्राह्मणवाद और पूंजीवाद. ... यदि समाजवाद लाना है, तो इसे लाने का सही तरीका है -- इसे जन-जन तक प्रचारित करना और आमजनों को इस उद्देश्य के लिए संगठित करना. समाजवाद गिने-चुने कुलीन वर्गों या भद्रजनों को रिझाने-फुसलाने से तो नहीं आयेग."

1937-38 में बाबा साहेब ने कम्युनिस्टों के साथ मिलकर किसानों की बड़ी-बड़ी रैलियां की. इन रैलियों में प्रसिद्ध कम्युनिस्ट नेता  शामलाल परूलेकर, बी टी रणदिवे, जी एस सरदेसाई तथा एस ए डांगे ने भी हिस्सा लिया. खोट प्रथा को समाप्त करने तथा साहूकारी शासन को हटाने की मांग को लेकर 12 मार्च, 1938 को बंबई में 20000 किसानों ने पदयात्रा की. कम्युनिस्टों व क्रांतिकारियों के प्रभाव को रोकने के लिए बंबई प्रांत के कांग्रेस मंत्रालय ने औद्योगिक विवाद विधेयक पेश किया. इसके खिलाफ व्यापक अभियान चलाया गया. 7 नवम्बर को हड़ताल आयोजित की गई और इसके आयोजन के लिए आईएलपी, कम्युनिस्टों तथा उदारवादियों की संयुक्त समिति गठित की गई. हड़ताल जबरदस्त रूप से सफल रही. एक लाख लोगों की सार्वजनिक रैली आयोजित हुई, जिसे अम्बेडकर व डांगे ने संबोधित किया. इस रैली में दलित कामगारों ने पूरी तरह से भाग लिया. रैली में पुलिस के साथ हुई झड़प में 683 मजदूर घायल हुए थे. बंबई में मृत कामगारों की स्मृति में कम्युनिस्टों के नेतृत्व वाली मजदूर यूनियन द्वारा आयोजित जुलूस और सभा में अम्बेडकर भी शामिल हुए.

इस प्रकार, इतिहास में बाबा साहेब के संघियों के साथ नहीं, बल्कि कम्युनिस्टों के साथ संबंधों के ही पुष्ट प्रमाण मिलते हैं.

लेकिन फिर भी यह स्पष्ट है कि बाबा साहेब मार्क्सवादी नहीं थे और कम्युनिस्ट भी अम्बेडकर की विचारधारा के अनुयायी नहीं है. शोषण से मानवता की मुक्ति की चाहत रखने वाली ये दोनों धाराएं कालांतर में समानांतर और सशक्त रूप से विकसित हुई. पहले के लिए जातिप्रथा का उन्मूलन सर्वोच्च था, दूसरे के लिए वर्गीय शोषण के खिलाफ संघर्ष का महत्त्व था. लेकिन स्वतंत्रता के बाद का अनुभव बताता है कि दोनों संघर्ष एक-दूसरे के पूरक हैं और संघर्ष की इन दोनों धाराओं में समन्वय आज सबसे बड़ी जरूरत है. जातिवाद के खिलाफ लड़ाई छेड़े बिना मजदूर के दिल में बैठे "ब्राह्मणवाद" को मारा नहीं जा सकेगा. यह 'ब्राह्मणवाद' वर्गीय एकता का सबसे बड़ा दुश्मन है, जो एक मेहनतकश को दूसरे मेहनतकश से अलग करता है. इसी प्रकार, वर्ग संघर्ष को तेज किये बिना संपत्ति के असमान वितरण की समस्या से नहीं जूझा जा सकता, क्योंकि वर्गीय शोषण जातीय भाईचारा नहीं देखता और अपने आर्थिक प्रभुत्व को बनाए रखने के लिए एक धनी दलित दूसरे गरीब दलित के शोषण से भी नहीं हिचकता. इसलिए वर्गीय दृष्टि से शोषित वर्ग की सामाजिक दृष्टि से दलित-वंचित-उत्पीड़ित तबकों के साथ एकता समाज के रूपांतरण के लिए बहुत जरूरी है -एक ऐसे समाज के निर्माण के लिए जहां सामाजिक न्याय, आर्थिक स्वतंत्रता व राजनैतिक अधिकार सुनिश्चित किये जा सके.

1890 में ज्योतिबा फुले ने कहा था -- " शिक्षा के अभाव में ज्ञान का लोप हो जाता है, ज्ञान के अभाव में विकास का लोप हो जाता है, विकास के अभाव में धन का लोप हो जाता है, धन के अभाव में शूद्रों का विनाश हो जाता है."  ज्योतिबा का यह कथन आर्थिक और सामाजिक मुद्दों को जोड़ने की राह दिखाता है.

आज ये दलित-उत्पीड़ित-वंचित तबके उत्पादन के साधनों व क्रय-शक्ति की सामर्थ्य - दोनों से वंचित हैं. जमीन पर अधिकार का मुद्दा इस तबके को एकजुट करता है और उसे वर्गीय शोषण और जातीय उत्पीड़न से लड़ने के लिए प्रेरित करता है. जल, जंगल, जमीन, खनिज व अन्य प्राकृतिक संसाधनों को जिस प्रकार कार्पोरेट लूट के हवाले किया जा रहा है और इस लूट को सुनिश्चित करने के लिए जिस प्रकार संविधान के बुनियादी आधारों पर हमला किया जा रहा है, उसके खिलाफ संघर्ष केवल वामपंथी तथा अम्बेडकर की विचारधारा से प्रतिबद्ध ताकतें ही चला सकती हैं. लाल रंग वर्ग संघर्ष का और नीला रंग सामाजिक न्याय का प्रतीक है. लाल और नीले की एकता -- कुंओं और कारखानों, खेतों व मंदिरों पर लाल व नीले झंडे की फरफराहट -- ही इस देश में बुनियादी परिवर्तन के संघर्ष को आगे बढ़ा सकती हैं. यही समय की मांग है. इसी मायने में बाबा साहेब आज भी प्रासंगिक हैं.